तकनीकी व्यवधानों और पाठकों की बदलती आदतों के बीच, भारतीय प्रकाशन उद्योग ने अपनी मजबूती साबित की है। नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला (NDWBF) 2026 के अवसर पर आयोजित 'सीईओ स्पीक' के 13वें संस्करण में उद्योग के दिग्गजों ने भविष्य की रूपरेखा के बारे में बताया। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास (एनबीटी) की ओर से आयोजित इस मंच पर बताया गया कि भारतीय प्रकाशन उद्योग का आकार अब 12 अरब डॉलर तक पहुंच गया है।
डिजिटल दौर में प्रिंट की मजबूती और रोजगार
रविवार (11 जनवरी) को होटल अशोक में आयोजित इस बिजनेस-टू-बिजनेस (B2B) फोरम में एनबीटी के निदेशक युवराज मलिक ने उद्योग के आंकड़ों को साझा किया। उन्होंने बताया कि भारतीय प्रकाशन बाजार में 68 प्रतिशत हिस्सेदारी शिक्षा-केंद्रित प्रकाशन की है। वहीं, 45 प्रतिशत बाजार क्षेत्रीय भाषाओं पर आधारित है। यह क्षेत्र देश में 12 लाख से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार मुहैया कराता है, इसमें 9000 से अधिक प्रकाशक और 21000 खुदरा विक्रेता शामिल हैं।
एआई चुनौती नहीं अवसर
सत्र के दौरान आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और मशीन लर्निंग के असर पर विस्तार से चर्चा हुई। एनबीटी के अध्यक्ष प्रो. मिलिंद सुधाकर मराठे ने बताया कि संपादकीय कार्यप्रणाली और सामग्री प्रसार में एआई और संवर्धित वास्तविकता (AR) परिवर्तनकारी भूमिका निभा रहे हैं। वहीं, शिक्षा मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव आनंदराव वी. पाटिल ने कहा कि डिजिटल पहल (जैसे दीक्षा और ई-पाठशाला) और एआई सृजनात्मकता को खत्म नहीं कर रहे, बल्कि सुगमता को बढ़ा रहे हैं।
वैश्विक सहयोग और 'थ्री टी' का मंत्र
इस वर्ष के सम्मानित अतिथि देश कतर और फोकस देश स्पेन के प्रतिनिधियों ने भी अपने अनुभव साझा किए। स्पेन के फेडरेशन ऑफ पब्लिशर्स गिल्ड के एमडी जोसे मैनुअल अंता ने बताया कि स्पेन में हर साल 60,000 मुद्रित और 27,000 डिजिटल पुस्तकें प्रकाशित होती हैं, जो एक विनियमित ढांचे का परिणाम है। भविष्य की दिशा तय करते हुए, एनबीटी ने 'थ्री टी' (Three Ts) कार्यक्रम- ट्रांसलेट (Translate), ट्रांसफॉर्म (Transform) और ट्रांसफर (Transfer)- पर जोर दिया। इसका मकसद अनुवाद और तकनीक जरिए वैश्विक ज्ञान के आदान-प्रदान को बढ़ाना है।
दूसरे सत्र में विशेषज्ञों के पैनल ने कॉपीराइट सुरक्षा, एआई के जिम्मेदार प्रयोग और डिजिटल जोखिमों पर चिंता जताई। पैनल ने निष्कर्ष निकाला कि डिजिटल और सब्सक्रिप्शन-बेस्ड रीडिंग मॉडल बढ़ रहे हैं, लेकिन इसके लिए सुदृढ़ नियामक तंत्र और लागत-कुशल कार्यप्रणालियों की आवश्यकता है।