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Cattle Economy: 'दूध नहीं, गोबर व खेती है प्राथमिकता', जानें तीन करोड़ पशुपालकों से जुड़ी रिपोर्ट में क्या

Tue, 20 Jan 2026 08:46 PM IST
कुमार विवेक बिजनेस डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

CEEW Cattle Economy Report: भारत के 38% पशुपालक दूध नहीं बेचते, बल्कि गोबर और घरेलू उपयोग के लिए मवेशी पालते हैं। CEEW की नई स्टडी में सामने आया कि पॉलिसी को सिर्फ डेयरी तक सीमित रखना गलत होगा। आइए इस बारे में जानें।
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पशुपालन (प्रतीकात्मक तस्वीर)। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है और यहां डेयरी सेक्टर को ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। लेकिन एक नई स्टडी ने इस धारणा को चुनौती दी है कि हर पशुपालक का मुख्य उद्देश्य केवल दूध बेचना होता है। 'काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर' (CEEW) की ताजा रिपोर्ट "बियान्ड द पेल: इंडियाज नन डेयरी कैटल इकोनॉमी" के मुताबिक, देश के एक तिहाई से अधिक (38%) पशुपालक दूध बेचते ही नहीं हैं। उनके लिए मवेशी पालने की मुख्य वजह घरेलू पोषण, गोबर और खेती में मदद है। यह रिपोर्ट नीति निर्माताओं के लिए एक बड़ा संकेत है कि भारत की 'गौधन अर्थव्यवस्था' को केवल डेयरी उत्पादन के चश्मे से देखना काफी नहीं होगा।

तीन करोड़ किसान दूध बिक्री को नहीं देते तरजीह

सीईईडब्ल्यू ने 15 राज्यों के 7,350 परिवारों का सर्वेक्षण किया, जो देश की 91% मवेशी आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं। आइए इस बारे में जानें।

  • बड़ा आंकड़ा: रिपोर्ट बताती है कि लगभग 38% पशुपालक- यानी करीब 3 करोड़ लोग- दूध बेचने के उद्देश्य से मवेशी नहीं पालते।
  • क्षेत्रीय विविधता: झारखंड में यह आंकड़ा सबसे चौंकाने वाला है, जहां 71% पशुपालक दूध बिक्री में शामिल नहीं हैं। पश्चिम बंगाल और हिमाचल प्रदेश में यह संख्या 50% से अधिक है।
  • विकसित राज्यों का हाल: महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों में, जहां डेयरी सेक्टर काफी संगठित है, वहां भी 30% से अधिक पशुपालक दूध के अलावा अन्य लाभों (गोबर और ड्राफ्ट पावर) को प्राथमिकता देते हैं।

स्टडी से पता चलता है कि मवेशी पालन का मकसद दूध बेचने से ज्यादा कुछ और ही है। 

  • गोबर और ड्राफ्ट पावर: राष्ट्रीय स्तर पर लगभग 7% (56 लाख) पशुपालक ऐसे हैं जो मवेशियों को पूरी तरह से गैर-दूध उद्देश्यों- जैसे गोबर, खेती के काम या जानवरों की खरीद-बिक्री- के लिए रखते हैं।
  • सामाजिक-सांस्कृतिक वजहें: हिमाचल, आंध्र प्रदेश और असम में 15% से अधिक लोग सामाजिक-धार्मिक कारणों से मवेशी रखते हैं।
  • प्राथमिकता: जब लाभों की रैंकिंग की गई, तो 34% ने घरेलू दूध खपत को और 20% ने गैर-दूध कारणों को अपनी पहली प्राथमिकता बताया।
  • चुनौतियां: चारा महंगा और योजनाओं की जानकारी नहीं रिपोर्ट ने जमीनी स्तर पर पशुपालकों की चुनौतियों को भी उजागर किया है:
  • जागरूकता की कमी: करीब तीन-चौथाई किसान चारे की कीमत से जूझ रहे हैं, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से 80% पशुपालकों को सरकार की 'साइलेज' और 'राशन-बैलेंसिंग' जैसी हस्तक्षेप योजनाओं की जानकारी ही नहीं है।
  • वेटनरी सेवाएं: पंजाब में पशु चिकित्सालयों की संख्या अधिक है, जबकि आंध्र प्रदेश में मोबाइल डिस्पेंसरी ज्यादा हैं। इसका असर यह है कि आंध्र में पशु स्वास्थ्य संबंधी बाधाएं कम रिपोर्ट की गई हैं।
  • आर्टिफिशियल इनसेमिनेशन (एआई): देसी गायों के मामले में एआई को अपनाने की दर केवल 34% है, जबकि क्रॉस-ब्रीड के लिए यह 76% है।

दूध आठ करोड़ किसानों की आजीविका का साधन

भारत में दूध का जीडीपी में योगदान करीब 5% है और यह आठ करोड़ किसानों की आजीविका का साधन है। लेकिन सीईईडब्ल्यू ने सिफारिश की है कि सरकार को 'वन-साइज-फिट्स-ऑल' (एक ही लाठी से सबको हांकने) वाली नीतियों से बचना चाहिए।

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• पॉलिसी शिफ्ट: रिपोर्ट के अनुसार 75% पशुपालक गोबर को मुख्य प्रेरणा मानते हैं, इसलिए गोबर आधारित वैल्यू क्रिएशन (जैसे बायोगैस, वर्मीकम्पोस्ट) के अवसरों को बढ़ाना चाहिए।
• इन्फ्रास्ट्रक्चर: राजस्थान, झारखंड और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में जहां किसान अपने पशुधन को बढ़ाना चाहते हैं, वहां सहायक बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की जरूरत है।
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रिपोर्ट के निष्कर्ष से साफ पता चलता है कि भारत का पशुपालन क्षेत्र सिर्फ 'सफेद क्रांति' (दूध के उत्पादन) तक सीमित नहीं है। अगर ग्रामीण इलाकों की आय बढ़ानी है, तो नीतियों में उन तीन करोड़ किसानों को भी केंद्र में रखना होगा जो दूध नहीं, बल्कि खाद और खेती के लिए पशु पालन कर रहे हैं।
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