विकास परियोजनाओं और बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए केंद्र सरकार को अक्सर भूमि अधिग्रहण करनी पड़ती है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि आखिरकार सरकार की भूमि अधिग्रहण नीति क्या है? अहम सवालों पर केंद्रीय कैबिनेट सचिव ने जटिल मुद्दों को गिनाते हुए कहा है कि फिलहाल नीतियों को बदलने की कोई योजना नहीं है। जानिए क्या है पूरा मामला
देश में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लंबित रहने में भूमि अधिग्रहण एक प्रमुख बाधा रहा है। कैबिनेट सचिव टीवी सोमनाथन ने कहा कि सरकार की भूमि अधिग्रहण नीति में बदलाव की कोई योजना नहीं है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में आयोजित सक्रिय शासन और समयबद्ध कार्यान्वयन (प्रगति) की 50वीं बैठक के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि 85 लाख करोड़ रुपये की 3,300 से अधिक परियोजनाओं में 7,735 मुद्दे उठाए गए थे, जिनमें से 7,156 का समाधान हो चुका है।
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जमीन अधिग्रहण करते समय किन मुद्दों से जूझना पड़ता है?
अधिग्रहण के दौरान सामने आने वाले मुद्दों का जिक्र करते हुए सोमनाथन ने बताया कि प्रगति के माध्यम से हल किए गए 7,156 मुद्दों में से 35 फीसदी भूमि अधिग्रहण से संबंधित थे, 20 फीसदी वन, वन्यजीव और पर्यावरण से जुड़े मुद्दे थे, 18 फीसदी उपयोग/मार्ग के अधिकार से संबंधित थे, और अन्य कानून-व्यवस्था, निर्माण, बिजली उपयोगिता की मंजूरी और वित्तीय मुद्दों के कारण विलंबित हुए थे।
सरकार परियोजनाओं की समीक्षा किस प्लेटफॉर्म से करती है?
उन्होंने कहा कि 500 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य की सभी परियोजनाओं की समीक्षा प्रगति प्लेटफॉर्म से की जाती है, और राज्य इस तंत्र के माध्यम से अपने मुद्दों को हल करने के इच्छुक हैं, जिसे लगभग एक दशक पहले तैयार किया गया था।