उद्योग निकाय पीएचडीसीसीआई ने बुधवार को 50 लाख रुपये तक की सालाना आय वाले लोगों के लिए आयकर की दरों में कमी करने और इससे अधिक आमदनी वालों पर ही 30 प्रतिशत की अधिकतम दर से कर लगाने की वकालत की है। सरकार की ओर से नई आयकर व्यवस्था में एक वर्ष में 24 लाख रुपये से अधिक कमाने वाले व्यक्तियों पर सबसे अधिक 30 प्रतिशत कर लगाने का प्रावधान किया गया है।
पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (पहले पंजाब हरियाणा और दिल्ली चेंबर के नाम से जाना जाता था) ने राजस्व सचिव अरविंद श्रीवास्तव को सौंपी गई अपनी बजट-पूर्व सिफारिशों में प्रत्यक्ष कर व्यवस्था में सुधारों के अलावा अप्रत्यक्ष कराधान पर भी राय दी है। सरकार ने अगला केंद्रीय बजट पेश करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण फरवरी में इसे संसद में पेश करेंगीं। प्रत्यक्ष करों के मोर्चे पर पीएचडीसीसीआई ने कहा है, "व्यक्तियों, साझेदारी फर्मों और सीमित देयता भागीदारी के लिए कराधान की दरों में कमी होनी चाहिए"।
पीएचडीसीसीआई ने कहा कि सरचार्ज के साथ कॉरपोरेट कर की दरें घटाकर 25 प्रतिशत कर दी गई हैं। यह दर 35 प्रतिशत (लगभग) से घटकर 25 प्रतिशत हो जाने के बावजूद इसका संग्रह 2018-19 के 6.63 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2024-25 में 8.87 लाख करोड़ रुपये हो गया। बीते कुछ वर्षों में इसमें पर्याप्त इजाफा देखा गया। चेंबर के अनुसार, इससे साफ तौर पर चलता है कि दरों में कमी के बावजूद अनुपालन बढ़ा है, जिससे इसके कारण सरकार को होने वाली आमदनी बढ़ी है।"
चेंबर ने अपनी सिफारिश में आगे कहा कि व्यक्तिगत कर के मामले में सबसे अधिक दर 30 प्रतिशत है। इसके अलावे 5 प्रतिशत से 25 प्रतिशत तक का सरचार्ज जोड़ने पर कुछ मामलों में कर की दर 39 प्रतिशत तक पहुंच जाती है। चेंबबर ने कहा, "करदाता इस उच्च कर दर के बोझ तले दबा हुआ है। कुछ स्थिति में करदाता की आय का 40 प्रतिशत हिस्सा सरकार को जाता है और महज 60 प्रतिशत ही उसके खुद के उपभोग के लिए बचता है।" अपनी सिफारिशों में चैंबर ने विकसित देशों में करदाताओं को मिलने वाले लाभों और सुविधाओं की भी चर्चा की है।
पीएचडीसीसीआई ने सरकार से मांग की है कि 30 लाख रुपये तक की आय पर अधिकतम कर की दर 20 प्रतिशत होनी चाहिए और 30 लाख से 50 लाख रुपये तक 25 प्रतिशत और 50 लाख रुपये से अधिक पर 30 प्रतिशत होनी चाहिए। इससे न केवल अनुपालन और कर राजस्व में बढ़ोतरी होगी बल्कि मध्यम वर्ग को भी बड़ी राहत मिलेगी।
पीएचडीसीसीआई ने कहा कि भारत में नई विनिर्माण इकाइयों की स्थापना को बढ़ावा देने के लिए आयकर अधिनियम की धारा 115बीएबी को फिर से लागू करना बहुत महत्वपूर्ण है। इसके तहत कुछ शर्तों का अनुपालन करने वाली नई विनिर्माण इकाइयों के लिए 15 प्रतिशत की रियायती कॉरपोरेट टैक्स और सरचार्ज की व्यवस्था की गई थी। सरकार की ओर से आयकर अधिनियम की धारा 115BAB सितंबर 2019 में शुरू की गई थी। इसके तहत 31 मार्च 2023 तक विनिर्माण शुरू करने वाली नई कंपनियों के को 15 प्रतिशत की रियायती आयकर दर (सरचार्ज के साथ) की अनुमति दी गई थी। इसे बाद में 31 मार्च 2024 तक बढ़ा दिया गया था।
चैंबर ने वित्त मंत्रालय को दिए अपने ज्ञापन में कहा, "15 प्रतिशत की रियायती कर दर विदेशी कंपनियों को भारत में सहायक कंपनियां स्थापित करने और विनिर्माण इकाइयों में निवेश करने के लिए एक बड़ा प्रोत्साहन प्रदान करेगी। इससे अर्थव्यवस्था के विकास, रोजगार सृजन में मदद मिलेगी और इसके परिणामस्वरूप भारत दुनिया में वस्तुओं के प्रमुख निर्माताओं में से एक बन सकता है।"
चेंबर के अन्य सुझाव शेयरों की पुनर्खरीद पर टैक्स, एमएसएमई को भुगतान, टीडीएस/टीसीएस प्रमाणपत्र की जरूरत, अनुमानित कर योजना और लाभांश आय पर कटौती से जुड़े हैं। अप्रत्यक्ष कर के मोर्चे पर पीएचडीसीसीआई ने सुझाव दिया है कि आयकर अधिनियम की तरह ही इसमें भी फेसलेस मूल्यांकन और ऑडिट को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। जीएसटी के भुगतान के बाद सेवाओं के लिए अग्रिम भुगतान पर इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) उपलब्ध कराया जाना चाहिए, यहां तक कि कर चालान प्राप्त होने से पहले भी। चेंबर ने अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों के प्रस्थान क्षेत्र से डीएफएस के माध्यम से बेचे गए 'भारत में निर्मित' माल के लिए ड्यूटी फ्री ऑपरेटरों (डीएफएस) को जीएसटी क्षतिपूर्ति उपकर की वापसी को सक्षम करने का मामला भी उठाया। उद्योग निकाय ने सरकार से यह भी सिफारिश की है कि एक से अधिक स्थानों और अलग-अलग जीएसटी पंजीकरण (एक ही या विभिन्न राज्यों में) वाली कंपनियों को एक ही पैन से जुड़ी इकाइयों के बीच आईटीसी स्थानांतरित करने की अनुमति दी जानी चाहिए।