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मध्य वर्ग को नुकसान: भारतीय अस्पतालों पर वॉल स्ट्रीट का 95,000 करोड़ का दांव; बोर्डरूम में खेल, मरीजों पर डाका

Tue, 06 Oct 2026 09:46 AM IST
ज्योति भास्कर एजेंसी, नई दिल्ली/मुंबई।

सार

अमेरिकी शेयर बाजार के बड़े निवेशक भारतीय अस्पतालों में निवेश के अवसरों को देखकर हजारों करोड़ के दांव लगा रहे हैं। हालांकि, बाजारों से जुड़े इस मामले में मध्य वर्ग को नुकसान हो रहा है। बोर्डरूम के अंदर होने वाले खेल से मरीजों की जेब पर डाका डाला जा रहा है। जानिए क्या है पूरा मामला
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अस्पतालों में महंगा इलाज बड़ी चिंता - फोटो : अमर उजाला प्रिंट- ग्राफिक्स
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विस्तार
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दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ते अस्पताल बाजार की तलाश में वॉल स्ट्रीट के दिग्गज निवेशक भारत पहुंचे लेकिन अरबों डॉलर के निवेश के साथ ही अब भारतीय स्वास्थ्य सेवा के सबसे बड़े सवाल पर आर-पार की जंग छिड़ गई है कि इतना महंगा मेडिकल बिल आखिर भरेगा कौन?

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कंसल्टेंसी फर्म ईवाई के आंकड़ों के मुताबिक, बीते 5 वर्षों में ब्लैकस्टोन केकेआर, टीपीजी, टेमासेक और जनरल अटलांटिक जैसे वैश्विक निजी निवेश फंड्स (पीई फंड्स) ने भारतीय अस्पतालों में हिस्सेदारी खरीदने के लिए लगभग 10 अरब डॉलर यानी 95,000 करोड़ का निवेश किया है।

ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस विदेशी पूंजी ने देश में अत्याधुनिक चिकित्सा उपकरण, नए बेड और बड़े अस्पतालों के विलय को बढ़ावा तो दिया है, लेकिन इसने भारत के मध्यम वर्ग के लिए इलाज को पहुंच से बाहर भी कर दिया है। उधर, बीमा कंपनियों का आरोप है कि वॉल स्ट्रीट फंड्स से चलने वाले अस्पताल अपने मुनाफेको चमकाने के लिए बिलों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहे हैं और मरीजों पर गैर-जरूरी व महंगी रोबोटिक सर्जरी थोप रहे हैं।
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मध्य वर्ग को नुकसान
एको के अनिमेष दास आगाह करते हैं कि इस पूरे खेल में सबसे बुरी तरह भारत का मिसिंग मिडल कुचला जाएगा यानी वे करोड़ों मध्यवर्गीय परिवार जो इतने गरीब नहीं हैं कि उन्हें सरकारी आयुष्मान योजना का लाभ मिले, और इतने अमीर भी नहीं हैं कि वे हर साल 13% की दर से बढ़ रहे मेडिकल बिलों और महंगे हेल्थ इंश्योरेंस प्रीमियम का बोझ उठा सकें।

रोबोटिक सर्जरी का फरेब और मरीजों की जेब पर डाका
जनरल इंश्योरेंस काउंसिल के हेल्थ इकोसिस्टम के सीईओ एस प्रकाश कहते हैं कि पीई फंड्स की पूंजी का जो टैक्स आम जनता को चुकाना पड़ रहा है, वह है इलाज की बेतहाशा लागत। सरकारी अस्पतालों की तुलना में निजी अस्पतालों में इलाज 5 से 10 गुना तक महंगा हो चुका है। निवा बूपा हेल्थ इंश्योरेंस के सीओओ भवतोष मिश्रा का कहना है कि अस्पताल मरीजों को रोबोटिक सर्जरी की ओर धकेलते हैं, जो पारंपरिक सर्जरी से कई गुना महंगी होती है लेकिन दोनों के क्लीनिकल नतीजों में कोई खास अंतर नहीं होता।

बेड से ज्यादा बोर्डरूम का खेल 
केरल के कानाटे हॉस्पिटल्स के मैनेजिंग डायरेक्टर और इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की स्टेट यूनिट के पूर्व अध्यक्ष जोसेफ बेनावेन भारतीय स्वास्थ्य सेवा के इस बदले मिजाज का कड़वा सच बयां करते हैं। उन्होंने कहा, भारतीय स्वास्थ्य सेवा में सबसे बड़ा बदलाव ऑपरेशन थिएटर के भीतर नहीं, बल्कि अस्पतालों के बोर्डरूम में हुआ है। आज डॉक्टरों और अस्पतालों का मूल्यांकन इस आधार पर हो रहा है कि वे प्रति बेड कितना रेवेन्यू कमाते हैं और निवेशकों को कितना रिटर्न दे रहे हैं।

  • भारत में प्रति 1,000 नागरिकों पर केवल 1.3 अस्पताल बेड हैं, जो विकसित देशों के औसत से बेहद कम है। पीई फंड्स ने इसी कमी को भुनाया। उन्होंने कार्डियक सर्जरी, ऑन्कोलॉजी (कैंसर) और ट्रांसप्लांट जैसे हाई-मार्जिन वाले स्पेशियल्टी क्षेत्रों पर अपना शिकंजा कस लिया।
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