एक बड़ा निर्णय लेते हुए जापान के केंद्रीय बैंक 'बैंक ऑफ जापान' (बीओजे) ने अपनी बेंचमार्क नीतिगत ब्याज दर में 25 बेसिस पॉइंट्स (0.25%) की बढ़ोतरी कर इसे 1.25% कर दिया है। वर्ष 1995 के बाद से यह जापानी ब्याज दरों का 31 साल का उच्चतम स्तर है। मार्च 2024 में शुरू हुई मौद्रिक नीति के सामान्यीकरण की प्रक्रिया के बाद से केंद्रीय बैंक ने अपनी दरों में बढ़ोतरी की गति को तेज कर दिया है। पिछली दर वृद्धि के छह महीने बाद जहां अगला कदम उठाया गया था, वहीं इस बार महज तीन महीने के भीतर ही दरों में बढ़ोतरी कर दी गई है। वैश्विक बाजारों, विनिमय दर और मुद्रास्फीति के जोखिमों के बीच लिया गया यह निर्णय दुनिया भर के निवेशकों और केंद्रीय बैंकों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
बैंक ऑफ जापान द्वारा जारी आधिकारिक बयान के अनुसार, दरों में वृद्धि का मुख्य कारण मुद्रास्फीति के 2% के लक्षित दायरे से ऊपर निकलने का बढ़ता जोखिम है। केंद्रीय बैंक का प्राथमिक उद्देश्य अंतर्निहित मुद्रास्फीति को "लगभग 2%" के स्तर पर स्थिर रखना है, ताकि कीमतों में अत्यधिक उछाल न आए और जापानी अर्थव्यवस्था पर इसका प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।
दरों में बढ़ोतरी का यह फैसला सर्वसम्मति से नहीं, बल्कि 7-2 के बहुमत से लिया गया। बोर्ड के दो सदस्यों तोइचिरो असादा और अयानो सातो ने इस फैसले के खिलाफ अपना वोट दिया और दरों को यथावत रखने की वकालत की। प्रधानमंत्री साने ताकाइची द्वारा इस वर्ष नियुक्त किए गए ये दोनों सदस्य 'रिफ्लेशनिस्ट' विचारधारा के माने जाते हैं।
नीतिगत दरों में वृद्धि के निर्णय के तुरंत बाद वित्तीय बाजारों में मिला-जुला रुख देखने को मिला:
इस नीतिगत फैसले के पीछे भू-राजनीतिक और कूटनीतिक कारक भी अहम रहे हैं। अमेरिका लगातार जापान पर अपनी ब्याज दरें बढ़ाने की प्रक्रिया जारी रखने के लिए दबाव बना रहा था। यह अमेरिकी रुख जापान की प्रधानमंत्री ताकाइची की आसान मौद्रिक नीति और विस्तारवादी राजकोषीय नीति की प्राथमिकताओं के विपरीत था।
इस महीने की शुरुआत में आयोजित जी-20 वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंक गवर्नरों की बैठक के दौरान अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने बीओजे गवर्नर काज़ुओ उएदा से मुलाकात कर बाजार और मौद्रिक मोर्चे पर निर्णायक कदम उठाने का सीधा सुझाव दिया था।
बैंक ऑफ जापान द्वारा 31 साल के उच्चतम स्तर पर ब्याज दरों को पहुंचाना यह स्पष्ट संकेत देता है कि दशकों की अत्यधिक सुस्त मौद्रिक नीति का दौर अब समाप्त हो चुका है। यद्यपि बोर्ड के भीतर आंतरिक मतभेद और घरेलू स्तर पर कोर मुद्रास्फीति की धीमी गति चिंता का विषय बनी हुई है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक दबाव और मुद्रास्फीति के जोखिमों ने बैंक को कड़ा रुख अपनाने पर मजबूर किया है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि बीओजे येन की स्थिरता और आर्थिक वृद्धि के बीच संतुलन कैसे बनाए रखता है।