लोकसभा में चुनाव सुधार और चुनाव आयोग की विश्वसनीयता को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस देखने को मिली। इस दौरान विपक्ष के वॉकआउट से पहले गृह मंत्री अमित शाह ने इतिहास और तथ्यों का हवाला देते हुए विपक्ष के आरोपों को खारिज किया। चुनाव आयोग पर मंगलवार को मनीष तिवारी की ओर से पूछे गए सवालों का जवाब देने के लिए बुधवार को गृह मंत्री अमित शाह ने मोर्चा संभाला।
चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर विपक्ष के हमलों का जवाब देते हुए अमित शाह ने कहा, "कल विपक्ष के नेता ने तीन सवाल पूछे थे और चार सुझाव दिए थे। पहले सवाल के जवाब में मैं बताना चाहता हूं कि 73 वर्ष तक देश में चुनाव आयुक्त की नियुक्ति का कोई कानून ही नहीं था। नियुक्ति प्रधानमंत्री सीधे कर देते थे।"
चयन समिति में विपक्ष की भूमिका पर शाह ने कहा, "2012 में जब सीईसी की नियुक्ति होनी थी तब आडवाणी जी ने पत्र लिखकर कहा था कि एक प्रणाली बनाई जाए, लेकिन कोई प्रणाली नहीं बनी। आप कहते हैं कि वहां (सीईसी) के चुनाव में हमारी बात सिर्फ 33 फीसदी होती है। जनता तय करती है कि 66 फीसदी कौन होगा। आप जीतिए और आप भी 66 फीसदी में जगह बनाइए। लेकिन आपने तो 100 फीसदी रखा था उनकी नियुक्ति में। हमने तो इसमें आपको जगह दी।" शाह ने विपक्ष की तैयारी पर तंज कसते हुए कहा, "इनका जो भाषण तैयार करते हैं वे रिसर्च नहीं करते।"
चुनाव आयोग की पारदर्शिता पर शाह ने स्पष्ट किया, "चुनाव आयोग ने कहा कि सीसीटीवी तक सामान्य व्यक्ति की पहुंच होनी चाहिए। कोई भी व्यक्ति उच्च न्यायालय जाकर 45 दिन के अंदर सीसीटीवी फुटेज निकलवा सकता है। राजनीतिक दलों को अगर चुनाव प्रक्रिया पर शक है तो वे चैलेंज करें, सीसीटीवी फुटेज हासिल कर सकें। राजनीतिक एजेंट्स भी इसे लेकर याचिका लगा सकते हैं, लेकिन करता कोई नहीं है। आप सिर्फ आरोप लगाते हैं। अब अगर सीसीटीवी फुटेज को लेकर हर कोई सीसीटीवी फुटेज की मांग करेगा तो कैसे चलेगा।"
अधिकारियों की सुरक्षा के मुद्दे पर शाह ने कहा, "इस देश को, लोकतंत्र को आप धूमिल नहीं कर सकते हैं। ढंग से भाषण तैयार करने सीखने चाहिए। एक उन्होंने कहा कि सीईसी को 2003 में कानून बनाकर इम्युनिटी दी। रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपुल्स एक्ट, 1950 में ही चुनाव आयोग के अधिकारियों को जो कुछ मिला है, उसमें हमने बदलाव नहीं किया है। हमने उसे सिर्फ आगे बढ़ाया है। चुनाव आयोग के कोई भी अधिकारी जिसके आयुक्त भी आते हैं उन पर चुनाव प्रक्रिया के लिए कोई मुकदमा नहीं चल सकता। हमने इसे देश के कानून में संगठित किया है।" अंत में कांग्रेस पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा, "इतने सारे कानून के जानकारों को राज्यसभा में रखा है, पता नहीं क्या करते रहते हैं।"
सदन में चुनाव सुधार पर चर्चा की शुरुआत करते हुए कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने कहा था कि "देश में निष्पक्ष चुनाव कराए जाने समय की मांग हैं।" उन्होंने संविधान के तहत चुनाव आयोग को मिले अधिकारों का जिक्र करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कार्यकाल को याद किया। तिवारी ने कहा कि "1988 में कांग्रेस सरकार ने इतिहास का सबसे बड़ा सुधार कराया।" चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए तिवारी ने आरोप लगाया कि आज चुनाव आयोग केंद्र के निर्देश पर काम कर रहा है। उन्होंने कहा, "चुनाव आयोग को पूरे राज्यों में एसआईआर नहीं कराए जा सकते।" ईवीएम के मुद्दे को जोर-शोर से उठाते हुए मनीष तिवारी ने सदन में कहा, "ईवीएम की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होते हैं, इन मशीनों का सोर्स कोड किसी और कंपनी के पास होना चिंताजनक है।"