पश्चिम एशिया की भू-राजनीति में आया नया उबाल वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए खतरे की घंटी बन गया है। अमेरिका और इस्राइल की ओर से ईरान के सैन्य और शीर्ष नेतृत्व के ठिकानों पर किए गए हमलों के बाद हालात तनावपूर्ण हो गए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान में प्रमुख युद्ध अभियानों की घोषणा कर दी है, जिसके बाद ईरान ने भी अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर जवाबी हमले किए हैं। इस सैन्य टकराव के बीच दुनिया भर की निगाहें होर्मुज जलडमरूमध्य पर टिक गई हैं, जिसके बाधित होने की आशंका से कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल का खतरा पैदा हो गया है। होर्मुज को तनाव की स्थिति में ईरान का आखिरी आर्थिक हथियार माना जाता है। आइए समझते हैं कि यह पूरा संकट क्या है और इसका भारतीय अर्थव्यवस्था पर क्या असर होगा।
रिपोर्टों के अनुसार, कई बड़ी तेल और ट्रेडिंग कंपनियों ने सुरक्षा जोखिम बढ़ने के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य से ईंधन और कच्चे तेल की आपूर्ति अस्थायी रूप से रोक दी है। एक प्रमुख ट्रेडिंग कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि उनके जहाज फिलहाल कुछ दिनों तक आगे नहीं बढ़ेंगे। यह फैसला संभावित हमलों और समुद्री सुरक्षा को देखते हुए लिया गया है।
यूरोपीय संघ के नौसैनिक मिशन एस्पाइड्स के एक अधिकारी ने शनिवार को कहा कि क्षेत्र में संचालित जहाजों को ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स से वीएचएफ रेडियो संदेश मिल रहे हैं, जिसमें चेतावनी दी गई है कि किसी भी जहाज को होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने की अनुमति नहीं है। दुनिया की ऊर्जा सप्लाई पर कितना बड़ा असर पड़ सकता है? इससे नीचे दिए गए तथ्यों से समझिए।
केप्लर लिमिटेड के विश्लेषकों के अनुसार, यदि ईरान केवल एक दिन के लिए भी इस रास्ते को ब्लॉक करता है, तो कच्चे तेल की कीमतें 120 डॉलर से 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं। तुलनात्मक रूप से, इस साल 20 फरवरी तक वैश्विक बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड का औसत मूल्य 66 डॉलर प्रति बैरल था। इस मार्ग के लंबे समय तक बंद रहने से ऊर्जा कीमतों में भारी उछाल आएगा, मुद्रास्फीति बढ़ेगी और वैश्विक अर्थव्यवस्था को गहरा झटका लगेगा।
ईरान के लिए इसे पूरी तरह बंद करना इतना आसान नहीं है। हालांकि ईरान ने अतीत में धमकियां दी हैं, लेकिन उसने कभी इसे पूरी तरह से बंद नहीं किया है क्योंकि इससे पश्चिमी नौसेनाओं की कड़ी प्रतिक्रिया का सामना करना पड़ सकता है। इसके अलावा:
विशेषज्ञ मान रहे हैं कि खाड़ी देशों को निशाना बनाए जाने से सिर्फ सैन्य नहीं बल्कि भू-राजनीतिक संतुलन भी बदल सकता है। यदि संघर्ष लंबा खिंचता है तो ऊर्जा आपूर्ति, निवेश प्रवाह और अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब हालात शांत होंगे तो दुनिया की आर्थिक और रणनीतिक व्यवस्था किस रूप में सामने आएगी।
यह भू-राजनीतिक संकट भारत के लिए एक सीधा आर्थिक खतरा है। भारत अपनी कच्चे तेल की मांग का लगभग 90% हिस्सा आयात करता है। भारत की 40% कच्चे तेल की खरीद मध्य पूर्वी देशों (इराक, सऊदी अरब, यूएई और कुवैत) से होती है और इसका अधिकांश हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य से ही होकर आता है। अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण भारत पहले ही रूस से तेल आयात कम कर रहा है, इसलिए यदि होर्मुज मार्ग बाधित होता है, तो रूस से आयात बढ़ाना एक आसान विकल्प नहीं होगा।
तेल आपूर्ति रुकने की आशंका से वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता बढ़ गई है। ऊर्जा कीमतों में संभावित उछाल से परिवहन, उद्योग और व्यापार पर असर पड़ सकता है। निवेशक स्थिति पर करीबी नजर बनाए हुए हैं क्योंकि पश्चिम एशिया में अस्थिरता का असर वैश्विक आर्थिक वृद्धि पर भी पड़ सकता है।
खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था बड़ी संख्या में विदेशी कामगारों और अंतरराष्ट्रीय कंपनियों पर आधारित है। यदि तनाव बढ़ता है तो लोगों की आवाजाही, व्यापारिक गतिविधियां और निवेश परियोजनाएं प्रभावित हो सकती हैं। इससे वैश्विक श्रम बाजार और वित्तीय प्रवाह पर भी असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।