देहरादून में अमर उजाला संवाद कार्यक्रम में पतंजलि आयुर्वेदा लिमिटेड के चेयरमैन आचार्य बालकृष्ण भी शामिल हुए। इस दौरान उन्होंने आयुर्वेद और एलोपैथी जैसी चिकित्सा पद्धतियों पर खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि चिकित्सा पद्धतियों के बीच सामंजस्य होना जरूरी है। उन्होंने कहा कि हम सभी को इतना आयुर्वेद जरूर जानना चाहिए कि छोटी बीमारियां होने पर हम अपने लिए कुछ सरल उपाय और समाधान खोज सकें। ये हैं आचार्य बालकृष्ण की बातचीत के प्रमुख अंश-
सवालः आयुर्वेद पर अपने अनुभव के बारे में बताइए।
आचार्य बालकृष्ण: मेरी मां जड़ी-बूटी की ज्ञाता रही। बचपन में कोई कष्ट परेशानी होती थी, तब माताजी की बहुत सारी कसैली दवाओं का हमने स्वाद लिया। आयुर्वेद हमारे ऋषियों की परंपरा है। हमारी परंपरा में कमोबेश हम सब आयुर्वेद से जुड़े हैं। इसलिए हमारे देश में दादी-नानी के नुस्खों की बात की जाती है। हर व्यक्ति आयुर्वेद के बारे में कुछ न कुछ जानता है। यह ऐसा समुद्र है जिसमें छोटे से छोटे बच्चा भी उसके किनारे पर खेल सकता है। सर्दी-जुकाम में हम काढ़ा पीने की बात करते हैं। शरीर में दर्द हो तो हल्दी में दूध की बात की जाती है। यह सब हम जीवन में करते तो रहते हैं, उसका बोध नहीं होता तो प्रवृत्ति कम बनती है। इतना तो आयुर्वेद जरूर जानना चाहिए कि छोटी बीमारियां होने पर अपने लिए कुछ सरल उपाय और समाधान खोज सकें।
सवालः गंभीर बीमारियों में लोग एलोपैथी की शरण लेते हैं। ऐसा क्यों?
आचार्य बालकृष्ण: हमारी अज्ञानता हो सकती है। लेकिन आयुर्वेद में भी इलाज है। कोरोना के समय जब सारी दुनिया के अंदर हाहाकार मचा, तब आयुर्वेद लोगों के लिए आशा की किरण बनकर सामने आया और कोरोनिल जैसी औषधि बनी। दुनिया के तमाम देशों में इस औषधि ने तहलका मचाया और कवर पेज पर स्थान पाया। रिसर्च पेपर में भी स्थान पाया। आयुर्वेद की शक्ति को दुनिया तक पहुंचाने की जरूरत है। आयुर्वेद पर भरोसा दिलाने वाले कामों में तमाम सरकारी संस्थाओं का योगदान 30 फीसदी है, पतंजलि का काम 70 फीसदी है। हमने विघ्नों में भी काम किया है। हम यही चाहते हैं कि हम अच्छा काम करें तो विघ्न न डालें। जड़ी-बूटियों की बात करें तो उत्तराखंड में 16 लाख टन हर्बल उत्पादन होता है। इससे ज्यादा की खरीद अकेले पतंजलि करता है।
सवालः कोई सुझाव जिससे उत्तराखंड की संभावनाओं को और टटोला जा सके।
आचार्य बालकृष्ण: उत्तराखंड में सात हजार से ज्यादा तरह के पेड़-पौधे और वनस्पतियां हैं। अधिकतर औषधीय गुणों से भरपूर हैं। आयुर्वेद में सात सौ किस्म के पौधों का जिक्र है। इनमें उत्तराखंड में तीन सौ किस्म के पौधे हैं। यह प्रांत प्रकृति का वरदान है। उत्तराखंड में मोटे अनाज की इतनी बड़ी संभावना है। घुटनों में दर्द होता है तो विटामिन सी और कैल्शियम के स्रोत ढूंढते हैं। आप चौलाई खाइए, बाजरा खाइए, ज्वार खाइए तो विटामिन सी और कैल्शियम की पूर्ति हो जाएगी। हमें टिकाऊ विकास की बात करनी चाहिए। जिन पदार्थों का हम उपभोग कर रहे हैं, उसका अंतत: पैसा किसे जा रहा है। स्वदेशी से स्वावलंबन की बात इसलिए है कि हमारे आसपास की विशेषताओं को हम समझने का प्रयास करें।
सवालः मोदी सरकार ने तो इस पर काफी काम किया है। क्या आपको लगता है कि आयुष मंत्रालय से कुछ लाभ मिला है?
आचार्य बालकृष्ण: यह अच्छा कदम है, लेकिन पर्याप्त नहीं है। गति होने से लक्ष्य मिलेगा। गति की गति बढ़ानी होगी। डब्ल्यूएचओ ने इस पर काम शुरू किया था। 1999 में इसे शुरू कर 2010 में यह काम बंद कर दिया। उस कार्य को पतंजलि पिछले 15 वर्ष से आगे बढ़ा रहा है। इसमें दुनियाभर के हर्ब्स का जिक्र जुटाया जा रहा है। पारंपरिक चिकित्सा पद्धति में चीन हमसे कहीं आगे है। हमें हर मामले में काम करने की जरूरत है। चिकित्सा पद्धतियों के बीच सामंजस्य होना चाहिए। इनके बीच प्रतिद्वंद्विता हो जाती है। अक्सर आयुर्वेद और
सवालः एलोपैथी और खासकर कोरोनिल पर विवाद, इस पर क्या कहेंगे?
आचार्य बालकृष्ण: सुनियोजित तरीके से आयुर्वेद को समाप्त करने का प्रयास हुआ है। 1972 में चीन में ऐसी ही स्थिति थी। चीन ने तब अनिवार्य कर दिया कि जो भी चिकित्सा डिग्रियां होंगी, उनके बच्चे शुरुआत में चाइनीज मेडिसिन को पढ़ेंगे। हमारे यहां बच्चों में हीनता का भाव भर दिया गया। एलोपैथी वालों के मन में यह भाव भर दिया गया कि हम ही बेहतर हैं। आयुर्वेद के लिए ऐसे-ऐसे लोग पैदा हो जाते हैं कि कहते हैं दंतकांति में लौंग का तेल इतना है कि दांत खराब हो रहे हैं। यह कहा जाने लगा कि आयुर्वेद से किडनी-लीवर खराब हो जाते हैं। हमने साबित किया कि किडनी-लीवर की खराबी आयुर्वेद से उल्टा ठीक हो जाती है। गिलोय को लेकर कहा गया कि लीवर खराब हो जाता है। यह फर्जी रिसर्च था। हमने उससे बड़ा रिसर्च किया कि गिलोय से लीवर खराब नहीं होता, ठीक होता है। आयुर्वेद ने एलोपैथी के विषय में कुछ कहने का साहस नहीं किया। लेकिन एलोपैथी वालों ने षड्यंत्र किया। समग्र उपचार व्यवस्था की बात अब होने लगी है। आयुर्वेद वालों को एलोपैथी की आवश्यकता हो तो इमरजेंसी में लेनी चाहिए क्योंकि कोई भी दवा पेट के अंदर में जाकर बायोकेमिस्ट्री होती है, वह फिर पैथी नहीं हो जाती।
सवालः योग गुरु रामदेव और आचार्य बालकृष्ण का मिलन कैसे हुआ?
आचार्य बालकृष्ण: यह योजना के हिसाब से नहीं था। यह दैवीय इच्छा थी। गुरुकुल में पढ़ते थे। वे सीनियर थे, मैं जूनियर था। हमारे पास साधन नहीं थे। ट्रस्ट के रजिस्ट्रेशन के लिए 12,500 की जरूरत थी, हमारे पास 1995 में उतने पैसे भी नहीं थे। हमने दो लोगों से कर्ज लिया था।
सवालः उत्तराखंड के लिए पतंजलि की क्या योजना है?
आचार्य बालकृष्ण: अभी तक सरकार के आंकड़ों के हिसाब से 97 हजार करोड़ का निजी क्षेत्र का निवेश हुआ है। 12 हजार करोड़ पतंजलि का है। नौकरियों में 10 प्रतिशत हमारी हिस्सेदारी है। पहाड़ों के पलायन को रोकने के लिए हमने सशक्तीकरण का काम किया है। प्रयासों में पतंजलि हमेशा साथ है। हमने कहा कि हमें रॉ मटेरियल दे दीजिए। जब पतंजलि छत्तीसगढ़, झारखंड और दक्षिण भारत से रॉ मटेरियल खरीद सकता है तो उत्तराखंड में कोई युवा इसकी पैदावार करेगा तो हम उसे प्राथमिकता देंगे।
सवालः एक समय महर्षि महेश योगी ने योग का प्रचार किया था। क्या पतंजलि की नींव मजबूत रहेगी?
आचार्य बालकृष्ण: हम सनातन वैदिक संस्कृति की बात करते हैं। 500 ऊर्जावान संन्यासियों की टीम पतंजलि के पास है। वही पतंजलि के उत्तराधिकारी हैं। हम विदेशी एमएनसी या कोई कॉर्पोरेट घराना नहीं हैं। आने वाली नई पीढ़ी ही इस पर काम करेगी। यह पारंपरिक कारोबार नहीं है। ब्रह्मचारी और संन्यासी ही पतंजलि के उत्तराधिकारी होंगे।
सवालः पतंजलि और रामदेव जी पर यह आरोप क्यों लगता है कि आप एक पक्ष का साथ देते हैं?
आचार्य बालकृष्ण: हमने न किसी राजनीतिक पार्टी की बात की, न सदस्यता की बात की। हमने देश-संस्कृति की बात की। जो इस बारे में सोचेंगे, हमारा उनको समर्थन रहेगा।