देश की घरेलू एल्युमिनियम उत्पाद निर्माण कंपनियां दोहरी चुनौती का सामना कर रही हैं। उन्हें एक तरफ कच्चे माल की महंगाई झेलनी पड़ रही है। दूसरी ओर, सस्ते आयात से कड़ी प्रतिस्पर्धा मिल रही है। इन कंपनियों को एल्युमिनियम पर लगने वाले 8.25 फीसदी आयात शुल्क से भारी चिंता है।
इस शुल्क का सबसे अधिक असर सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) पर पड़ने की आशंका है। इनकी कुल उत्पादन लागत में कच्चे माल की हिस्सेदारी काफी अधिक होती है। ऐसे में अब उन्होंने अगले वित्त वर्ष के केंद्रीय बजट में प्राथमिक एल्युमिनियम पर आयात शुल्क पूरी तरह खत्म करने की मांग की है।
एल्युमिनियम एक्सट्रूजन मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को एक बजट-पूर्व ज्ञापन भेजा है। इसमें मौजूदा 7.5 फीसदी मूल सीमा शुल्क (बीसीडी) को शून्य करने का प्रस्ताव दिया गया है। संगठन ने बताया कि 7.5 फीसदी मूल सीमा शुल्क के साथ 10 फीसदी सामाजिक कल्याण अधिभार भी लगता है। इससे कुल प्रभावी आयात शुल्क 8.25 फीसदी हो जाता है।
क्या है उद्योग की मुख्य मांग?
घरेलू एल्युमिनियम उद्योग की मुख्य मांग प्राथमिक एल्युमिनियम पर आयात शुल्क को शून्य करना है। वर्तमान में इस पर 7.5 फीसदी मूल सीमा शुल्क और 10 फीसदी सामाजिक कल्याण अधिभार लगता है। यह कुल मिलाकर 8.25 फीसदी का प्रभावी शुल्क बन जाता है। उद्योग का मानना है कि यह शुल्क उनकी उत्पादन लागत को बढ़ा रहा है। इस कारण वे अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धी नहीं रह पा रहे हैं।
शुल्क घटने से क्या लाभ होगा?
प्राथमिक एल्युमिनियम पर शुल्क कम होने से घरेलू प्रसंस्करण उद्योग को बड़ी राहत मिलेगी। इससे एल्युमिनियम से बने उत्पाद बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी हो सकेंगे। कच्चे माल की लागत कम होने से घरेलू उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा। साथ ही, निवेश और खपत में भी वृद्धि हो सकती है। एल्युमिनियम का इस्तेमाल ऑटोमोबाइल, निर्माण, विद्युत एवं इलेक्ट्रॉनिक्स, पैकेजिंग, नवीकरणीय ऊर्जा और बुनियादी ढांचे जैसे क्षेत्रों में बढ़ सकता है।
क्यों बढ़ रही है घरेलू निर्माताओं की मुश्किल?
एल्युमिनियम एक्सट्रूजन मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष जीतेंद्र एच चोपड़ा ने बताया कि घरेलू निर्माताओं की मुश्किलें बढ़ रही हैं। उन्हें मुक्त व्यापार समझौतों के तहत रियायती या शून्य शुल्क पर भारत आने वाले उत्पादों से मुकाबला करना पड़ रहा है। इसका अर्थ है कि भारतीय कंपनियों के लिए कच्चा माल महंगा हो जाता है। वहीं, प्रतिस्पर्धी देशों के उत्पाद कम शुल्क पर घरेलू बाजार में आसानी से पहुंच जाते हैं। यह स्थिति घरेलू उद्योग के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है।