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लाइफ साइकिल फंड: लक्ष्य के हिसाब से बदलेगा निवेश; शेयरों का जोखिम कब घटेगा और क्या हैं इसके फायदे?

Mon, 12 Oct 2026 06:58 AM IST
निर्मल कांत मोहित गंग, को-फाउंडर, मनीफ्रंट

सार

जब भी हम भविष्य के किसी बड़े वित्तीय लक्ष्य, जैसे बच्चों की उच्च शिक्षा, सपनों का घर या अपनी रिटायरमेंट के लिए निवेश करना शुरू करते हैं, तो सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि पैसे कहां लगाएं?
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक
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विस्तार
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पारंपरिक तौर पर हम यह सोचते हैं कि कौन-सा शेयर या म्यूचुअल फंड खरीदें। लेकिन अब बाजार में एक नया और बिल्कुल अलग कॉन्सेप्ट आ चुका है, जो यह नहीं पूछता कि ‘आप कौन-सा एसेट खरीदना चाहते हैं?’, बल्कि यह पूछता है कि ‘आपको पैसों की जरूरत कब पड़ेगी?’ यहां बात हो रही है, लाइफ साइकिल फंड्स की।
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लाइफ साइकिल फंड क्या है?
यह एक ओपन-एंडेड म्यूचुअल फंड है, जिसे एक टारगेट ईयर को ध्यान में रखकर डिजाइन किया जाता है। इसमें ग्रोथ एसेट्स (इक्विटी) और अपेक्षाकृत रक्षात्मक एसेट्स (डेट) का मिश्रण होता है। जैसे-जैसे समय बीतता है, एक पूर्व-निर्धारित ग्लाइड पाथ इक्विटी को कम करता है और पोर्टफोलियो के रक्षात्मक वजन को बढ़ाता है।

ओपन-एंडेड का मतलब है कि निवेशक आम तौर पर व्यावसायिक दिनों में खरीद और रिडीम कर सकते हैं। टारगेट ईयर का मतलब वह वर्ष है, जिसके आसपास लक्ष्य की उम्मीद है।
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कैसे काम करता है ग्लाइड पाथ?
ग्लाइड पाथ समय के साथ एसेट एलोकेशन को बदलने का रोडमैप है। जब लक्ष्य बहुत दूर होता है, तो पोर्टफोलियो में शेयरों का हिस्सा ज्यादा रखा जाता है, ताकि तेजी से मुनाफा बन सके। लेकिन जैसे-जैसे टारगेट ईयर नजदीक आता है, फंड मैनेजर खुद-ब-खुद शेयरों से पैसा निकालकर सुरक्षित फिक्स्ड इनकम और अन्य विकल्पों में शिफ्ट करने लगता है।
  • रनवे की तरफ उतरते हुए एक विमान की कल्पना करें। टारगेट ईयर नियोजित लैंडिंग जोन है, जबकि ग्लाइड पाथ यह बताता है कि पोर्टफोलियो रास्ते में कितनी क्रमिक रूप से जोखिम को कम करता है।
  • सेबी व्यापक गलियारे तय करता है। एएमसी उनके भीतर वास्तविक मार्ग चुनती है। उदाहरण के लिए, एक 2041 फंड 65% दिशात्मक इक्विटी रख सकता है, जबकि दूसरा 80% रख सकता है, फिर भी 10 से 15 साल बाकी रहने पर दोनों नियमों का पालन करते हैं।

ये भी पढ़ें: आरबीआई का नया नियम: बैंक-डीमैट खातों की जानकारी एक जगह, भूली रकम का पता लगाना कितना आसान होगा?

टारगेट मैच्योरिटी फंड्स और एनपीएस से कैसे अलग है?
अक्सर लोग इसे दूसरी योजनाओं से मिला देते हैं, लेकिन फर्क साफ है। टारगेट मैच्योरिटी फंड मुख्य रूप से एक पैसिव डेट फंड होता है, जिसके बॉन्ड एक निश्चित वर्ष में परिपक्व होते हैं। वहीं, लाइफ साइकिल फंड एक मल्टी-एसेट (इक्विटी, डेट, सोना-चांदी आदि) समाधान है, जो समय के साथ खुद-ब-खुद एसेट एलोकेशन बदलता है।

वहीं दूसरी ओर एनपीएस पूरी तरह से आपकी उम्र के आधार पर एसेट बदलता है और रिटायरमेंट पर केंद्रित होता है। इसके विपरीत, म्यूचुअल फंड का लाइफ साइकिल फंड आपकी उम्र पर नहीं, बल्कि आपके चुने हुए वित्तीय लक्ष्य के वर्ष (जैसे 2041 या 2050) पर काम करता है और इसे आप किसी भी लक्ष्य के लिए चुन सकते हैं।

जानना जरूरी है  

टैक्स के मोर्चे पर रखें सावधानी 
  • इस श्रेणी का सबसे दिलचस्प पहलू टैक्स से जुड़ा है। सिर्फ इसलिए कि सेबी इसके एक हिस्से को इक्विटी कहता है, यह स्वचालित रूप से टैक्स के लिहाज से शुद्ध इक्विटी फंड नहीं बन जाता।
  • टैक्स का वर्गीकरण इस पर निर्भर करता है कि कानून व फंड की वास्तविक होल्डिंग्स क्या कहती हैं।
  • कई फंड्स अंतिम वर्षों में आर्बिट्रेज रणनीति का इस्तेमाल करके इक्विटी का कोटा बनाए रखते हैं, लेकिन फिर भी निवेश से पहले एएमसी से स्पष्ट टैक्स स्थिति की जानकारी जरूर ले लेनी चाहिए।

किसे चुनना चाहिए ये फंड्स?
  • ये उन निवेशकों के लिए सबसे मुफीद हैं, जिनके पास स्पष्ट वित्तीय लक्ष्य हैं, लेकिन जो खुद से बार-बार पोर्टफोलियो की समीक्षा करने का समय या विशेषज्ञता नहीं रखते हैं।
  • चाहे कार खरीदनी हो, डेस्टिनेशन वेडिंग करनी हो या रिटायरमेंट की प्लानिंग हो, आप अपनी डेडलाइन के हिसाब से ऐसा फंड चुन सकते हैं।
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निवेश से पहले इन बातों का रखें खास ख्याल
  • सुनिश्चित करें कि आपका व्यक्तिगत वित्तीय लक्ष्य, फंड की मैच्योरिटी डेट से पूरी तरह मेल खाता हो।
  • यदि आप 1 से 3 साल के भीतर पैसा निकालते हैं, तो एग्जिट लोड का नियम लागू हो सकता है। इसके अलावा, इनका टैक्स ट्रीटमेंट मानक हाइब्रिड म्यूचुअल फंड नियमों के अनुसार ही होता है।
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