डिजिटल इंडिया की पहल पर मोबाइल वॉलेट के शुरू होने से लोगों को रुपयों के लेन-देन में आसानी हो चली है। विनोद उपाध्याय ऑटो चलाते हैं। जब उनकी सवारी ऑटो से उतर कर अपना मोबाइल फोन तलाशने लगती है, वो राहत की सांस लेते हैं। वे मुंबई में बीते 25 सालों से ऑटो चलाकर अपनी जीविका कमाते रहे हैं।
कई बार भाड़ा लेते समय खुल्ले पैसे की किल्लत से उन्हें जूझना पड़ता है। वे आसपास की दुकान में जाकर खुले पैसे का इंतजाम करने की कोशिश करते हैं। इस चक्कर में कई बार सवारी से बकझक भी हो जाती है। वे कहते हैं, "कई बार सवारियों को लगता है कि मैं झूठ बोल रहा हूं ताकि बचे पैसे अपनी जेब में डाल सकूं।" पर बीते छह महीनों से विनोद उपाध्याय को इन सब दिक्कतों का सामना नहीं करना पड़ता है।
वे अब मोबाइल वॉलेट से पैसे लेते हैं और उनका लेनदेन पूरी तरह कैशलेस होता है। यह काफी आसान भी है। इसके लिए एक ऐप होता है। सवारी 'लॉग इन' करने के बाद उनका फोन नंबर उसमें डालती है रकम डाल कर 'पे' बटन को दबा देती है। तुरंत उपाध्याय के मोबाइल फोन पर भुगतान का एसएमएस आ जाता है। मुंबई की कंपनी 'ऑनगो' ने यह ऐप तैयार किया है। यह तो शुरुआत भर है।
2017 तक अमेरिका को पछाड़ देगा भारत
मुंबई के ढाई लाख ऑटो चालकों में से सिर्फ दस प्रतिशत ही अभी कैशलेस भुगतान स्वीकार करते हैं। आने वाले दिनों में इसके काफी तेजी से आगे बढ़ने की संभावना है। कैशलेस भुगतान तेजी से बड़ रहा है। लोग इसके जरिए टैक्सी-ऑटो का भुगतान करते हैं, सिनेमा के टिकट खरीदते हैं, रेस्तरां में बिल चुकाते हैं और दुकानों से सामान खरीदने पर भुगतान करते हैं।
एक दूसरे मोबाइल वॉलेट 'साइट्रस पे' के संस्थापक जीतेंद्र गुप्ता कहते हैं, "आने वाले दिनों में लोग रोजमर्रा के कामकाज में नकद या कार्ड के बजाय मोबाइल वॉलेट से ही भुगतान करेंगे।" इसकी वजह यह है कि स्मार्टफोन के लिए दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ रहे बाजारों में एक भारत है।
समझा जाता है कि साल 2017 तक यह अमरीका को भी पीछे छोड़ देगा और दुनिया का सबसे बड़ा स्मार्टफोन बाजार बन जाएगा। भारत में इस समय 28 करोड़ लोग इंटरनेट इस्तेमाल करते हैं। साल 2017 तक ऐसे लोगों की तादाद बढ़कर 31.40 करोड़ हो जाने की संभावना है।
पंद्रह गुना बढ़ा मोबाइल से भुगतान
ग्रोथप्रैक्सिस के मुताबिक, मोबाइल से होने वाला भुगतान साल 2012 और साल 2015 के बीच पंद्रह गुना बढ़ गया है। इस समय भारत में 1.40 अरब डॉलर का भुगतान मोबाइल फोन से होता है। दिलचस्प बात यह है कि तकरीबन 60 फीसदी लोग ऐसे हैं, जिन्होंने पहली बार इंटरनेट का इस्तेमाल मोबाइल फोन पर ही किया।
प्राइस-वाटरहाउस-कूपर्स इंडिया के वित्तीय सेवा विशेषज्ञ विवेक बेलगावी ने बीबीसी को बताया, "पहले ज्यादातर लोग मोबाइल इंटरनेट का इस्तेमाल सोशल नेटवर्किंग साइट्स के लिए करते थे। यह अब बदल रहा है। ज्यादा से ज्यादा लोग मोबाइल भुगतान के लिए इंटरनेट का इस्तेमाल करने लगे हैं।" ये ऐप ग्राहकों के लिए मुफ्त होते हैं। पर भुगतान लेने वालों को इस पर पैसे चुकाने होते हैं।
वे बाजार में 'डिस्काउंट' और दूसरे तरह तरह के 'ऑफर' देते हैं। तो क्या मोबाइल वॉलट 'कैशलेस' अर्थव्यवस्था का रास्ता साफ कर रहे हैं। पर लगता है कि यह अभी तो नहीं हो पाएगा। हालांकि स्मार्टफोन की बिक्री देश में तेजी से बढ़ रही है, मोबाइल नेटवर्क की गुणवत्ता अभी भी एक बहुत बड़ा मुद्दा है।
मोबाइल वॉलेट कंपनियों के दिक्कत बनी कनेक्टिविटी समस्या
अभी भी ज्यादातर मोबाइल 2जी पर ही काम करते हैं। हालांकि शहरों में 3जी कनेक्शन बढ़ रहे हैं, कॉल की खराब गुणवत्ता और इंटरनेट की गड़बड़ी की शिकायतें आम हैं।दूरसंचार कंपनियों का कहना है कि मोबाइल स्पेक्ट्रम की कमी की वजह से ये शिकायतें हो रही हैं।
मोबाइल वॉलेट कंपनियों की चिंता यह है कि इस तरह की अनिश्चितता से उनकी विकास योजनाओं पर बुरा असर पड़ सकता है। गुप्ता कहते हैं, "मोबाइल भुगतान की सबसे बड़ी दिक्कत कनेक्टिविटी है। आज हालत यह है कि आपके पास 3जी कनेक्शन है भी तो ज्यादातर समय आप 2जी नेटवर्क पर ही रहते हैं।" अब सबकी निगाहें 4जी पर टिकी हुई हैं। यह पूरे देश में ही शुरू हो रहा है।
दूरसंचार कंपनियों का दावा है कि वे इस बार बेहतर सेवा दे पाएंगी। बेलगावी कहते हैं, "मोबाइल भुगतान के क्षेत्र में ग्राहकों को अच्छा अनुभव 4जी से ही हो पाएगा।"तो क्या भारत में भी मोबाइल भुगतान कीनिया जैसा हो पाएगा, यह सवाल उठना लाजिमी है। कीनिया में 90 फीसदी लोगों ने वोडाफोन के एम-पेसा भुगतान प्लैटफॉर्म पर अपना पंजीकरण करवाया है।
भारत में बैंकों की एक लाख से ज्यादा शाखाएं हैं। पर इनमें से 20 प्रतिशत से भी कम शाखाएं ग्रामीण इलाकों में हैं। इसी जगह भारत के आधे से अधिक लोग रहते हैं। यदि तेज और भरोसेमंद मोबाइल नेटवर्क भारत के गांवों तक पहुंचता है तो मोबाइल वॉलेट का जबरदस्त विकास होगा।