दुनियाभर में, खास तौर पर पश्चिम एशिया में चल रहे भू-राजनीतिक तनाव ने वैश्विक अर्थव्यवस्था की चिंताएं बढ़ा दी हैं। लेकिन इन बाहरी चुनौतियों के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था एक मजबूत दीवार की तरह खड़ी है। सरकारी सूत्रों के मुताबिक, पश्चिम एशिया संकट के कारण बाहरी चुनौतियां जरूर हैं, लेकिन देश की घरेलू खपत अब भी बेहद मजबूत बनी हुई है। सरकार से जुड़े सूत्रों ने भी इसकी पुष्टी की है।
केंद्र सरकार के सूत्रों के अनुसार, पश्चिम एशिया के संकट के कारण भारत के सामने मुख्य रूप से कच्चे तेल और फर्टिलाइजर के महंगे आयात की बाहरी चुनौती खड़ी हो गई है। इसका सीधा असर ईंधन बाजार पर पड़ रहा है। वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें ज्यादा होने के बावजूद देश में तेल कंपनियों को काफी कम कीमत पर ईंधन बेचना पड़ रहा है, जिसके कारण उन्हें हर दिन करीब 650 करोड़ रुपये का भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।
राहत की बात यह है कि इन तमाम बाहरी चुनौतियों के बावजूद देश की आर्थिक विकास दर पर कोई दबाव या तनाव नहीं है। सरकारी अधिकारियों का कहना है कि पिछले वित्त वर्ष की मार्च तिमाही में विकास की जो रफ्तार दिखी थी, वह चालू वित्त वर्ष (FY27) की पहली तिमाही में भी पूरी तरह बरकरार है। इसके अलावा, विदेशों में काम करने वाले भारतीयों द्वारा भेजे जाने वाले पैसे पर भी अब तक कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा है।
महंगाई को कंट्रोल करने और महत्वपूर्ण सेक्टर्स को राहत देने के लिए सरकार बड़े कदम उठा रही है। इसके तहत दो प्रमुख फैसले सामने आए हैं:
अर्थव्यवस्था में नकदी और निवेश का प्रवाह तेजी से बनाए रखने के लिए सरकार की रणनीति बिल्कुल साफ है।
वैश्विक संकट, महंगे फर्टिलाइजर और कच्चे तेल के भारी आयात बिल के कारण भारत पर वित्तीय दबाव जरूर है, लेकिन मजबूत घरेलू खपत के दम पर अर्थव्यवस्था सुरक्षित है। विदेशी निवेश और विनिवेश पर सरकार का सकारात्मक रुख यह दिखाता है कि भारत भविष्य की चुनौतियों से निपटने और अपनी विकास यात्रा को जारी रखने के लिए पूरी तरह तैयार है।