शुक्रवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया 64 पैसे टूटकर 93.53 के अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर बंद हुआ। विदेशी कोषों की लगातार निकासी और कच्चे तेल की कीमतों में तेज वृद्धि के कारण भारतीय मुद्रा पर दबाव देखा गया। भू-राजनीतिक तनाव बढ़ने से भी निवेशकों की धारणा प्रभावित हुई, जिससे रुपये में यह बड़ी गिरावट दर्ज की गई।
विदेशी मुद्रा व्यापारियों ने बताया कि ईरान संघर्ष के तीसरे सप्ताह ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर गंभीर चिंताएं बढ़ा दी हैं। ईरान और ओमान के बीच स्थित ऊर्जा आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण जलमार्ग, होर्मुज जलडमरूमध्य के बड़े पैमाने पर बंद होने से कच्चे तेल की कीमतों में तेज वृद्धि देखी जा रही है। इससे व्यापक मुद्रास्फीति का डर पैदा हो रहा है। भू-राजनीतिक अनिश्चितता के जोखिम ऊर्जा लागत को बढ़ा रहे हैं, जिससे व्यापार घाटा बढ़ सकता है और मुद्रास्फीति का दबाव बढ़ सकता है। इन वैश्विक कारकों का सीधा असर भारतीय रुपये पर पड़ रहा है।
घरेलू शेयर बाजार के मोर्चे पर, सेंसेक्स गुरुवार की गिरावट से उबरकर 325.72 अंक या 0.44 फीसदी बढ़कर 74,532.96 पर बंद हुआ। निफ्टी भी 112.35 अंक या 0.49 फीसदी बढ़कर 23,114.50 अंक पर पहुंच गया। हालांकि, एक्सचेंज के आंकड़ों के अनुसार, विदेशी संस्थागत निवेशकों ने शुक्रवार को शुद्ध आधार पर 5,518.39 करोड़ रुपये के शेयर बेचे। विदेशी कोषों की यह लगातार निकासी रुपये पर दबाव का एक प्रमुख कारण बनी हुई है। यह स्थिति भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय है।
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने शुक्रवार को बताया कि 13 मार्च को समाप्त सप्ताह के दौरान भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 7.052 अरब डॉलर घटकर 709.759 अरब डॉलर रह गया। इससे पिछले रिपोर्टिंग सप्ताह में कुल भंडार 11.683 अरब डॉलर घटकर 716.81 अरब डॉलर हो गया था। हालांकि, 27 फरवरी को समाप्त सप्ताह के दौरान यह कोष 4.885 अरब डॉलर बढ़कर 728.494 अरब डॉलर के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया था। भंडार में यह गिरावट भी रुपये पर अप्रत्यक्ष दबाव डालती है। विदेशी मुद्रा भंडार में कमी से बाजार में रुपये की आपूर्ति पर असर पड़ता है।