डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया गुरुवार को शुरुआती कारोबार में 32 पैसे टूटकर 95.20 के सर्वकालिक निचले स्तर (ऑल-टाइम लो) पर आ गया है। इस भारी गिरावट के पीछे मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, मजबूत अमेरिकी डॉलर और पश्चिम एशिया में गहराता भू-राजनीतिक तनाव है। मुद्रा बाजार में मचे इस हाहाकार के बीच घरेलू शेयर बाजारों में भी भारी बिकवाली देखने को मिली है।
विशेषज्ञों का मानना है कि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI) लगातार भारतीय इक्विटी और डेट (जिसका प्रतिफल बुधवार को 7 प्रतिशत तक पहुंच गया था) की बिक्री कर रहे हैं और वे लगातार डॉलर के खरीदार बने हुए हैं।
आगे का आउटलुक और आर्थिक प्रभाव
विदेशी मुद्रा कारोबारियों के अनुसार, अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये में अभी और गिरावट देखी जा सकती है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से भारत की आयात लागत में भारी वृद्धि होने की पूरी आशंका है, जो अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा झटका है। पश्चिम एशिया में संभावित व्यापक संघर्ष की चिंताएं निवेशकों की घबराहट लगातार बढ़ा रही हैं, जिससे आने वाले समय में बाजार में अस्थिरता बनी रहने की संभावना है।