भारतीय रिजर्व बैंक और सरकार के बीच तनातनी काफी बढ़ गई है। आर्थिक मामलों के सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य के पहले दिए गए बयान का ट्विटर पर मजाक उड़ाया। इससे मामले के ठंडा होने की गुंजाइश काफी कम हो गई हैं।
किया था यह ट्वीट
गर्ग ने रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य की हाल की टिप्पणियों पर व्यंग्य करते हुए शुक्रवार को ट्वीट किया, 'डॉलर के मुकाबले रुपया 73 से कम पर ट्रेड कर रहा है, कच्चा तेल 73 डॉलर के नीचे आ गया है, सप्ताह के दौरान शेयर बाजार 4 फीसदी ऊपर रहा और बॉन्ड यील्ड्स 7.8 फीसदी के नीचे आ गया। क्या यही बाजारों का आक्रोश है?'
गर्ग हैं आरबीआई, सरकार के बीच सेतू
RBI
सुभाष गर्ग सरकार और आरबीआई के बीच होने वाली सभी तरह की वार्तालाप के बीच एक तरह से सेतू का काम करते हैं। इस तरह से सरकार ने दो दिन पहले ही बेहद सधे शब्दों में बयान जारी कर इसी बात पर नाराजगी जाहिर की थी कि आरबीआई ने सरकार के साथ मतभेदों को सार्वजनिक कर दिया। हालांकि, वक्तव्य में यह भी कहा गया था कि सरकार और केन्द्रीय बैंक दोनों को ही अपने कामकाज में सार्वजनिक हित और भारतीय अर्थव्यवस्था की जरूरतों को देख कर चलना चाहिए।
इसलिए बढ़ी तनातनी
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) गवर्नर की ताकत घटा कर बैंक में अपना ज्यादा से ज्यादा दखल बढ़ाने के प्रयासों में लगी सरकार का मकसद है बैंक की जमा पूंजी से राजकोषीय घाटा कम करना। बैंक के पास मौजूदा समय में करीब 3.5 खरब रुपये का कोष है। यह कोष दो-चार साल में नहीं, बल्कि तीन दशक के बाद इस स्तर तक पहुंचा है। ऑल इंडिया रिजर्व बैंक इंप्लॉय एसोसिएशन (एआईआरबीईए) का कहना है कि सरकार अपना घाटा पूरा करने के लिए इस कोष को अपने कब्जे में लेना चाहती है। यही वजह है कि सरकार प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तरीके से आरबीआई गनर्वर की शक्तियां कम करने का हर संभव प्रयास कर रही है।
सरकार मोनेटरी पॉलिसी कमेटी पर नियंत्रण करना चाहती है
बैंक अधिकारियों का कहना है कि सरकार की मंशा अब दिन-प्रतिदिन खराब होती जा रही है। गवर्नर की पावर कम करने के साथ-साथ वित्त मंत्रालय अब आरबीआई की मोनेटरी पॉलिसी कमेटी पर नियंत्रण करना चाहती है। इस कमेटी में छह सदस्य होते हैं, जिनमें तीन बैंक के प्रतिनिधि और तीन सरकार द्वारा नामित सदस्य होते हैं। कमेटी में गवर्नर को वीटो करने की पावर हासिल है। बैंक जिस दर पर लोन देते हैं, वह सब यही कमेटी तय करती है। पिछली कई बैठकों में देखने को मिला है कि सरकार के प्रतिनिधि बैंक लोन की दरें कम कराने के लिए अड़ जाते हैं।