केंद्र की मोदी सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक के बीच कड़वाहट और नीतिगत मतभेद बढ़ता ही जा रहा है। इस बढ़ते मतभेद और कड़वाहट के बीच आरबीआई ऐक्ट के सेक्शन-7 की चर्चा गर्म है। कई मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक केंद्र सरकार आरबीआई ऐक्ट के सेक्शन-7 लागू करने पर विचार कर रही है।
ये पहली बार है जब आजाद भारत की किसी सरकार में आरबीआई के खिलाफ सेक्शन-7 लागू करने पर चर्चा हो रही है। सोशल मीडिया पर भी इसकी खासी चर्चा है और ट्विटर पर RBI Act ट्रेंड कर रहा है। वित्त मंत्रालय ने इस बात की पुष्टि की है कि उसने हालिया कुछ हफ्तों में सेक्शन-7 के प्रावधानों का इस्तेमाल करते हुए रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल को कई चिट्ठियां भेजी थीं।
इन चिट्ठियों में नकदी प्रवाह से लेकर एनपीए (नॉन परफॉर्मिंग ऐसेट्स), नॉन-बैंक फाइनैंस कंपनियों और पूंजी की जरूरत जैसे तमाम मुद्दों की चर्चा की गई थी।
ऐसे में अहम सवाल ये है कि आरबीआई ऐक्ट का सेक्शन-7 आखिर है क्या?
-वैसे तो रिजर्व बैंक अपने आप में एक स्वायत्त निकाय है और सरकार से अलग अपने फैसले लेने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन कुछ तय स्थितियों में इसे सरकार के निर्देश सुनने पड़ते हैं।
-आरबीआई ऐक्ट का सेक्शन-7 सरकार को यह अधिकार देता है कि वो रिजर्व बैंक को निर्देश जारी कर सके।
-सेक्शन-7 कहता है कि केंद्र सरकार समय-समय पर जनता के हित को ध्यान में रखते हुए और ऱिजर्व बैंक के गवर्नर से बात करके उसे निर्देश जारी कर सकती है।
-सेक्शन-7 लागू होने के बाद बैंक के कारोबार से जुड़े फैसले आरबीआई गवर्नर के बजाय रिजर्व बैंक के 'बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स' लेंगे। यानी आसान शब्दों में कहें तो सेक्शन-7 कहीं न कहीं आरबीआई गवर्नर के अधिकारों को कमजोर करता है।
-गवर्नर और उसके द्वारा नामित डेप्युटी गवर्नर की ग़ैरमौजूदगी में भी 'सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स' के पास सरकार के दिए निर्देशों का पालन करने का अधिकार होगा। यानी 'बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स' वो सारे फैसले लेने के लिए स्वतंत्र होगा जो सामान्य तौर पर रिजर्व बैंक लेता है।