Bank of Baroda, South African
इन्फोसिस के ही एक अन्य पूर्व सीएफओ टीवी मोहनदास पई ने हालांकि नीति आयोग के पूर्व वाइस चेयरमैन अरविंद पनगढ़िया से सहमति जताई, जिन्होंने एसबीआई को छोड़कर अन्य सरकारी बैंकों के निजीकरण की वकालत की है। पई ने कहा कि हां, मैं पनगढ़िया के साथ सहमत हूं। सरकारी बैंकों को संचालन की आजादी चाहिए। अभी की समस्या है मालिक, जो उन्हें पूरी क्षमता से काम नहीं करने देता।
दक्ष और फुर्तीली संरचना की जरूरत
एक बड़े सरकारी बैंक के एक सेवानिवृत्त चेयरमैन तथा एमडी ने सुझाव दिया कि सरकारी बैंकों के बोर्डों की ताकत बढ़ाई जानी चाहिए और उन्हें इस सेक्टर की कार्यप्रणाली में बड़ा सुधार करने के लिए नेतृत्व का चयन करने तथा अच्छे मानव संसाधन को नियुक्त करने की आजादी मिलनी चहिए।
उन्होंने कहा कि तेजी से बदल रही दुनिया में सरकारी बैंकों को अनेक तकनीक अपनाने होंगे और उन्हें अपनी संरचना को तेज और फुर्तीला बनाना होगा। उन्होंने कहा कि बोर्ड को सशक्त करने की जरूरत है, क्योंकि उसका समय बैंक के साथ अधिक गुजरता है। उन्हें नेतृत्व और रणनीति पर फैसला करने की आजादी दी जानी चाहिए।
मंत्रालय द्वारा लिया जाने वाला साक्षात्कार काफी नहीं
उन्होंने कहा कि बोर्ड को सशक्त करने, सही परंपरा, आपदा प्रबंधन प्रक्रिया, निगरानी और सही समाधान अपनाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि बोर्ड को नेतृत्व (चेयरमैन, कार्यकारी निदेशक) तय करना चाहिए, उसे यह तय करना चाहिए कि कैसे नियुक्ति हो, कौन-कौन से लोग वहां होने चाहिएं। फैसला उन्हें लेने चाहिए, न कि मंत्रालय आपको हर वक्त निर्देश दे।
पूर्व अधिकारी ने कहा कि आज वित्त मंत्रालय अगले तीन साल तक बैंक के प्रमुख को नियुक्त करने के लिए 45 मिनट का साक्षात्कार लेता है। कुछ लोग बात करने में कुशल होते हैं और संभव है कि वे काम करने में कुशल न हों। आप यह एक छोटे से साक्षात्कार में तय नहीं कर सकते हैं।