निजीकरण से हमेशा अच्छा ही नहीं होता और मालिकाना हक कोई मायने नहीं रखता, क्योंकि निजी तथा सार्वजनिक दोनों ही क्षेत्रों में अच्छी तथा खराब कंपनियां मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि बैंकिंग को लेकर मेरा यही विचार है कि वर्तमान में भारत की सामाजिक आर्थिक अवस्था सरकारी बैंकों के व्यापक निजीकरण के माकूल नहीं है।
कुमार ने यहां माइंडमाइन समिट 2018 में कहा कि हो सकता है कि अगले 50 वर्षों में आप विकास के उस स्तर तक पहुंच जाएं, अगर आप लगातार वर्तमान रफ्तार से विकास करते रहें। सरकारी बैंक वाणिज्यिक इकाइयों से थोड़ा बढ़कर है, क्योंकि उन्हें सामाजिक उत्तरदायित्वों को पूरा करना होता है और उन्होंने इसे अच्छे तरीके से किया है। उल्लेखनीय है कि कुछ उद्योग संगठनों ने कहा है कि सरकार को सरकारी बैंकों के निजीकरण पर विचार करना चाहिए, क्योंकि पिछले 11 वर्षों के दौरान इन बैंकों में 2.6 लाख करोड़ रुपये से अधिक के पुन: पूंजीकरण की उनकी आर्थिक हालत को सुधारने की दिशा में सीमित भूमिका रही है।
पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी) में 13,000 करोड़ रुपये से अधिक का घोटाला सहित कई घोटालों के सामने आने के बाद मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन तथा नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया सहित कई विशेषज्ञों ने सरकारी बैंकों के निजीकरण पर जोर दिया है।