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राहतः बीमा कंपनियों को बताना होगा क्लेम का स्टेटस, क्षेत्रीय भाषा में मिलेगी पॉलिसी

Wed, 10 Apr 2019 07:17 PM IST
paliwal पालीवाल बिजनेस डेस्क, अमर उजाला
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बीमा कंपनियों द्वारा उपभोक्ताओं के दावे को लटकाने के रवैये पर लगाम कसने के लिए इरडा ने सख्त निर्देश जारी किए हैं। बीमा नियामक ने बुधवार को जारी नोटिफिकेशन में कहा कि कंपनियां 1 जुलाई से बीमाधारक को क्लेम के हर स्टेटस की जानकारी देंगी। इस कदम से उपभोक्ताओं के दावे निपटाने में तेजी आएगी और जल्द भुगतान सुनिश्चित किया जा सकेगा।

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बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण ने कंपनियों को जारी निर्देश में कहा कि जुलाई से बीमाधारक को क्लेम सेटलमेंट के हर स्टेटस की पूरी जानकारी देनी होगी। साथ ही धारकों के हितों की रक्षा सुनिश्चित करने के लिए मजबूत संवाद तंत्र तैयार करना होगा।

नियामक ने कहा कि बीमाधारक के पास अपने दावे की जानकारी पाने के लिए ट्रैकिंग मैकेनिज्म होना चाहिए और उसे हर चरण की स्थिति पता चलनी चाहिए। इससे दावा निपटान प्रक्रिया में पारदर्शिता आने के साथ जल्द भुगतान का बेहतर तंत्र विकसित किया जा सकेगा। सभी बीमा कंपनियां 1 जुलाई के बाद यह सुनिश्चित करेंगी कि वे अपने धारकों को क्लेम प्रोसेसिंग के हर चरण की जानकारी दे रही हैं। 

टीपीए नहीं होंगे जिम्मेदार

इरडा ने कहा कि स्वास्थ्य बीमा के क्षेत्र में जहां थर्ड पार्टी एडमिनिस्ट्रेशन (टीपीए) जुड़ा होता है, ऐसे मामलों की जानकारी देना उसकी जिम्मेदारी नहीं होगी। नियामक ने स्पष्ट किया कि क्लेम के मामलों में भी बीमा कंपनियां ही ग्राहकों को सभी जानकारी और स्टेटस मुहैया कराएंगी। इसमें टीपीए की कोई भूमिका नहीं होगी। स्पष्ट और पारदर्शी संवाद होने से बीमा पॉलिसी की सेवा में तेजी आएगी और इसके लाभ समयबद्घ तरीके से पहुंचाने में मदद मिलेगी। 

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हर माध्यम से करें संपर्क

बीमा कंपनियों को अपने ग्राहकों के साथ हर माध्यम से संपर्क करना होगा। इरडा ने कहा कि लाइफ, हेल्थ और जनरल इंश्योरेंस के मामले में बीमा कंपनियां ग्राहकों को पत्र, ई-मेल, एसएमएस सहित सभी संपर्क माध्यमों से जानकारी उपलब्ध कराएंगी।

स्वास्थ्य बीमा के मामले में आईडी सहित अन्य जानकारी या तो टीपीए उपलब्ध कराए अथवा बीमा कंपनियों को ही जिम्मेदारी लेनी होगी। उनका काम उपभोक्ताओं को जागरूक करना भी होगा।

क्षेत्रीय भाषाओं का इस्तेमाल

नियामक ने कहा कि कंपनियों को बीमा पॉलिसी में सामान्य और आसानी से पढ़ने व समझने वाली भाषा का इस्तेमाल करना होगा। साथ ही जरूरत पड़ने पर हिंदी या अंग्रेजी के बजाए बीमाधारक की क्षेत्रीय और स्थानीय भाषा का भी इस्तेमाल करना पड़ेगा। कंपनियों को ये सभी सुधार अगले ढाई महीने में लागू करने होंगे।
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