पंजाब एंड महाराष्ट्र सहकारी (पीएमसी) बैंक पर छाये संकट के बादलों को दूर करने की कोशिशों के साथ ही सरकार इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण बदलावों पर भी गंभीरता से विचार कर रही है। इसके तहत केंद्र सरकार सहकारी क्षेत्र के नियमन प्रक्रिया में बदलाव करेगी और इसे भी अन्य बैंकों की तरह आरबीआई जैसे किसी नियामक के दायरे में लाया जा सकता है और राजनीतिक दखल पर भी अंकुश लग सकता है।
वित्त मंत्रालय के एक अन्य अधिकारी का कहना है कि सहकारी बैंक अभी भी दोहरे नियमन से गुजर रहे हैं। हालांकि, बैंकिंग नियमन कानून 1949 में संशोधन कर वर्ष 1966 से ही सहकारी बैंकों को भी आरबीआई के दायरे में लाया जा चुका है, लेकिन अभी इस पर नियंत्रण सहकारी समितियों के पंजीयक का ही है। इन बैंकों की स्थापना ही सहकारी नियमों के तहत होती है और इस पर राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक का भी हस्तक्षेप होता है। लिहाजा इसे किसी एक नियामक के दायरे में लाने पर विचार चल रहा है। साथ ही इसका प्रबंधन राजनीतिक व्यक्ति से अलग कर किसी पेशेवर के हाथ सौंपा जा सकता है और इस बारे में विशेषज्ञों से भी सलाह ली जाएगी।
ग्रामीण क्षेत्र में बैंकिंग सुविधा के जानकार और नेशनल फेडरेशन ऑफ आरआरबी एम्पलॉइज के महासचिव शिवकरण द्विवेदी का कहना है कि सहकारी बैंकों में हद से ज्यादा राजनीतिक हस्तक्षेप है। इनके अध्यक्ष का चुनाव वोट के जरिये होता है और यह संगठन पैसों के लेन-देन से जुड़ा है। अध्यक्ष बनने के लिए राजनीतिक पृष्ठभूमि का व्यक्ति जोड़तोड़ कर पद हासिल कर लेता है और बड़े लेनदेन में उसकी ही चलती है। वित्त मंत्रालय के अधिकारी ने यह भी संकेत दिया है कि इन बैंकों की उपयोगिता पर विशेषज्ञों से बातचीत होगी। एक साल पहले आरबीआई ने भी शहरी सहकारी बैंकों को लघु वित्तीय बैंकों में बदलने का विकल्प दिया था।