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हिमालय का वो 'कीड़ा', जो बिकता है 10 लाख रुपये किलो, यह दुनिया में सबसे महंगा

Tue, 07 Apr 2020 03:00 PM IST
सोनू शर्मा फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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दुनिया का सबसे महंगा 'कीड़ा' - फोटो : Social media
दुनियाभर में कीड़ों की ऐसी कई प्रजातियां हैं, जिन्हें लोग बड़े चाव से खाते हैं, लेकिन आज हम जिस कीड़े के बारे में बताने जा रहे हैं, वो बाकी कीड़ों से बिल्कुल अलग है। अलग इसलिए, क्योंकि इसका इस्तेमाल जड़ी-बूटी की तरह किया जाता है। यह कीड़ा भूरे रंग का होता है और दो ईंच तक लंबा होता है। इसकी सबसे खास बात कि इसका स्वाद मीठा होता है। यह हिमालयी क्षेत्रों में तीन से पांच हजार मीटर की ऊंचाई पर पाया जाता है। 
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दुनिया का सबसे महंगा 'कीड़ा' - फोटो : Social media
इसके कई नाम हैं। भारत में इसे 'कीड़ा जड़ी' के नाम से जाना जाता है जबकि नेपाल और चीन में इसे 'यार्सागुम्बा' कहते हैं। वहीं तिब्बत में इसका नाम 'यार्सागन्बू' है। इसके अलावा इसका वैज्ञानिक नाम 'ओफियोकोर्डिसेप्स साइनेसिस' है जबकि अंग्रेजी में इसे 'कैटरपिलर फंगस' कहते हैं, क्योंकि यह फंगस (कवक) की प्रजाति से ही संबंध रखता है। 
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दुनिया का सबसे महंगा 'कीड़ा' - फोटो : Social media
इसे 'हिमालयन वियाग्रा' भी कहते हैं। इसका इस्तेमाल ताकत बढ़ाने की दवाओं समेत कई कामों में होता है। यह रोग प्रतिरक्षक क्षमता को बढ़ाता है और फेफड़े के इलाज में भी यह काफी कारगर है। हालांकि यह बेहद ही दुर्लभ और खासा महंगा भी है। इसके महंगा होने का अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि महज एक कीड़ा लगभग 1000 रुपये का मिलता है। वहीं अगर किलो के हिसाब से देखें तो नेपाल में यह 10 लाख रुपये प्रति किलो तक बिकता है। इसी कारण इसे दुनिया का सबसे महंगा कीड़ा कहा जाता है। 

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दुनिया का सबसे महंगा 'कीड़ा' - फोटो : Social media
भारत के कई हिस्सों में, कैटरपिलर कवक का संग्रह कानूनी है, लेकिन इसका व्यापार अवैध है। पहले नेपाल में यह कीड़ा प्रतिबंधित था, लेकिन बाद में इस प्रतिबंध को हटा दिया गया। कहते हैं कि इसका इस्तेमाल जड़ी-बूटी के रूप में आज से नहीं बल्कि हजारों सालों से किया जा रहा है। नेपाल में तो लोग इन कीड़ों को इकट्ठा करने के लिए पहाड़ों पर ही टेंट लगा लेते हैं और कई दिनों तक वहीं पर रहते हैं। 
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कैटरपिलर कवक - फोटो : Social media
यार्सागुम्बा के पैदा होने की कहानी भी बड़ी अजीब है। यह हिमालयी क्षेत्रों में उगने वाले कुछ खास पौधों से निकलने वाले रस के साथ पैदा होते हैं। इनकी अधिकतम आयु छह महीने ही होती है। अक्सर सर्दियों के मौसम में ये पैदा होते हैं और मई-जून आते-आते ये मर जाते हैं, जिसके बाद लोग इन्हें इकट्ठा करके ले जाते हैं और बाजारों में बेच देते हैं। 
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