आज की डिजिटल दुनिया में बातचीत के लिए शब्दों का होना जरूरी नहीं रह गया है। खुशी जतानी हो, दुख जाहिर करना हो या सामने वाले की बात समझ आने का संकेत देना हो, एक छोटा सा इमोजी ही काफी होता है। लेकिन इन्हीं इमोजी में एक ऐसा भी है, जिसका मतलब हर किसी के लिए एक जैसा नहीं है। बात हो रही है थंब्स-अप की, जिसे लेकर सोशल मीडिया पर नई बहस छिड़ गई है। तो आइए जानते हैं।
थंब्स-अप इमोजी को लेकर छिड़ी बहस
किसी के लिए यह इमोजी बेहद नॉर्मल है। इसका सीधा मतलब होता है, ठीक है, समझ गया या कोई दिक्कत नहीं। लेकिन कुछ लोगों को यही इशारा बातचीत में रूखापन घोलता नजर आता है। खासकर तब जब काफी लंबी बातचीत या बहस के बाद सामने से सिर्फ थंब्स-अप का जवाब आए।
लोगों ने बताया नाराजगी जताने का रवैया
युवाओं के एक वर्ग का मानना है कि ऐसे जवाब से लगता है कि सामने वाला बातचीत को आगे बढ़ाने में दिलचस्पी नहीं रखता। कई बार यह 'जैसा तुम्हें ठीक लगे’ या ‘मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता’ जैसे भाव भी पैदा करता है। इसी वजह से कुछ लोग इसे पैसिव-एग्रेसिव यानी बिना सीधे नाराजगी जताए अपना रवैया दिखाने वाला जवाब मानते हैं।
लंबा जवाब देना नहीं है संभव
हालांकि इसके दूसरे पहलू को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कई लोग कहते हैं कि हर संदेश का लंबा जवाब देना संभव नहीं होता। ऐसे में थंब्स-अप यह बताने का आसान तरीका है कि मैसेज पढ़ लिया गया है और बात समझ में आ गई है। दिल्ली की एक छात्रा का कहना है कि जिंदगी पहले ही काफी दिक्कतें हैं, इसलिए एक नॉर्मल इमोजी को जरूरत से ज्यादा पढ़ने की जरूरत नहीं।
बॉस की तरफ से आया थंब्स-अप है नॉर्मल
दिलचस्प बात यह है कि इमोजी का असर रिश्ते के हिसाब से भी बदल जाता है। ऑफिस में बॉस या सीनियर की ओर से आया थंब्स-अप नॉर्मल लग सकता है, लेकिन किसी करीबी दोस्त से यही जवाब मिलने पर कुछ लोगों को यह बेरुखा महसूस होता है। कई लोग खुद भी इसका इस्तेमाल करते हैं, मगर उनके लिए इसका अर्थ कभी ‘नोट कर लिया’ तो कभी ‘ठीक है, जैसा तुम चाहो’ होता है। पीढ़ियों के बीच भी इसका फर्क साफ दिखता है। बुजुर्गों के लिए थंब्स-अप आमतौर पर सहमति और समझ का संकेत है, जबकि कई युवाओं को इसमें ठंडापन नजर आता है।
दो हिस्सों में बंटा सोशल मीडिया
यही वजह है कि सोशल मीडिया पर बहस दो हिस्सों में बंटी हुई है। एक पक्ष इसे सुविधाजनक जवाब मानता है, जबकि दूसरा इसे बातचीत खत्म करने वाला रूखा संकेत बताता है। फिलहाल इतना तो तय है कि डिजिटल बातचीत में एक छोटा सा भी रिश्ते, उम्र और परिस्थिति के हिसाब से बिल्कुल अलग अर्थ पैदा कर सकता है।