साजिश के किसी भी किस्से के मशहूर होने की पहली शर्त यही है। खलनायक ऐसा होना चाहिए जिस पर सहजता से विश्वास हो जाए। कोरोना वायरस को लेकर जो भी अफवाहें फैलीं, उनके पीछे जो विलेन बताए गए, उन्हें लेकर पहले से ही अविश्वास का माहौल था। नतीजा ये कि साजिशों के किस्से मशहूर होने में देर नहीं लगी।
साझा चिंताएं
केंट यूनिवर्सिटी की सामाजिक मनोविज्ञानिक कैरेन डगलस कहती हैं, 'पूरी दुनिया में लोग ऐसी साजिशों पर सहज ही भरोसा कर लेते हैं, जो सांस्कृतिक और एतिहासिक घटनाओं से जुड़े होते हैं। जो खास जगहों पर हुई होती हैं, जिनमें धार्मिक अल्पसंख्यक, अमीर लोग, दुश्मन देश और रहस्यमय तकनीकें शामिल होती हैं।'
हर समाज में अपनी चिंताएं होती हैं। लोगों की सनक होती है। साजिशों के जो किस्से कामयाब होते हैं, वो इनका लाभ उठाते हैं। जैसे कि, भारत में अल्पसंख्यकों के खिलाफ माहौल, जो तमाम पूर्वाग्रहों के कारण पैदा हुआ है। या फिर, अमेरिका में नस्लवादी सोच के चलते अक्सर गोरे और अश्वेत लोगों के बीच साजिशों के किस्से पनपते हैं।
कबीलावाद
कैरेन डगलस कहती हैं, 'अक्सर आप देखते हैं कि किसी देश के खास समूह या लैंगिक समुदाय के लोगों को निशाना बनाकर साजिशों के किस्से मशहूर किए जाते हैं। इस बात के कई सबूत मिलते हैं कि लोग अक्सर अपने पूर्वाग्रहों के हिसाब से साजिशों की बात को सही मानने लगते हैं।'
अनिश्चितता का माहौल
कैरेन डगलस कहती हैं कि जब भी अनिश्चितता का माहौल होता है, या संकट आता है, तो लोग साजिशों की कहानियों पर ज्यादा यकीन करने लगते हैं। जैसे कि कोविड-19 को लेकर फैली अफवाह कि इसके पीछे 5G तकनीक है। अभी ये संकट गहराया ही नहीं था कि 5G तकनीक को निशाना बनाकर किस्से गढ़ लिए गए। इसकी दो वजहें थीं। पहली तो ये कि नई तकनीक को लेकर तरह-तरह की आशंकाएं पहले से ही थीं। और दूसरी बात इसके पीछे चीन की नीयत पर भी बहुत से लोगों को शक था।
नतीजा ये कि वायरस से तेजी से साजिश का ये किस्सा फैल गया। किसी भी साजिश के दावे के पीछे एक अच्छी कहानी के सारे किरदार होने जरूरी हैं। एक डराने वाला खलनायक, नैतिक सबक और तार्किक प्लॉट। अक्सर, लोग अपनी धार्मिक आस्थाओं के कारण भी साजिशों के ऐसे दावों पर सहजता से भरोसा कर लेते हैं।
किसी आपदा के समय सरकार या भरोसेमंद संस्था की ओर से जानकारी की कमी भी साजिश के दावों को बढ़ावा देती है। आज, बहुत सी संस्थाओं पर जनता का भरोसा कम हो गया है। ऐसे में सोशल मीडिया पर साजिश का कोई भी दावा बड़ी तेजी से लोकप्रिय हो जाता है। फिर उसे झुठलाने में बरसों लग जाते हैं।
बदनीयती वाली साजिश
कई बार सियासी लीडर, अपने हित साधने के लिए साजिशों के किस्से को बढ़ावा देते हैं। साल 2016 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में हिलेरी क्लिंटन के एक सहयोगी पर बच्चों का सेक्स रैकेट चलाने के आरोप लगे थे। दावा किया गया था कि ये सेक्स रैकेट पिज्जा की एक दुकान के बेसमेंट में चल रहा था। सच ये था कि पिज्जा की इस दुकान के नीचे कोई बेसमेंट तक नहीं था। फिर भी, हिलेरी क्लिंटन को बदनाम करने वाली ये साजिश महीनों तक हवा में तैरती रही।
डार्टमाउथ कॉलेज, न्यू हैम्पशायर के राजनीति विज्ञानी रसेल म्योरहेड को एक अलग चिंता सता रही है। वो कहते हैं कि पहले साजिशों के ये किस्से कमजोर तबके का हथियार हुआ करते थे, जो अमीरों और ताकतवर लोगों को निशाना बनाने के काम आते थे।
ट्रंप इसकी बड़ी मिसाल हैं...
मगर, अब षडयंत्रों की ऐसी कहानियों को बड़े बड़े नेता बढ़ावा देते हैं, ताकि अपने राजनीतिक हित साध सकें। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप इसकी बड़ी मिसाल हैं, जो अपने विरोधियों पर बेलगाम होकर इल्जाम लगाते हैं। रसेल म्योरहेड का कहना है कि आने वाले समय में अगर राजनेताओं का यही रवैया रहा, तो आम जनता को इसके बहुत बुरे नतीजे भुगतने होंगे।
साजिशों के ऐसे किस्सों से बचने के लिए हमें क्या करना चाहिए?
रसेल म्योरहेड कहते हैं, 'आज सरकारों से, संस्थाओं पर से और विशेषज्ञों पर से लोगों का भरोसा उठ चुका है। वो लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी यकीन नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे में जरूरत ऐसी संस्थाओं और व्यवस्थाओं में फिर से यकीन जगाने की है।'
कैरेन डगलस कहती हैं, 'तमाम रिसर्च से ये बात साबित होती है कि हम साजिशों के युग में जी रहे हैं। मगर इसके कोई पक्के सबूत हमारे पास नहीं हैं।' ऐसे में कब, कहां और कैसे, किस नई साजिश की कहानी का जन्म होगा, किसी को नहीं पता।