वो उस नवजात को लेकर एक पुल की तरफ़ भागे। कन्हैया के पीछे-पीछे उस नवजात का पिता और बाक़ी लोग भी भागने लगे। ऐसा करने के लिए कन्हैया के पास बहुत वक़्त नहीं था, लेकिन उन्होंने कर दिखाया। कन्हैया ने बच्चे को निकाला ही था कि पुल बाढ़ के पानी में बह गया। पल भर में ही लगा कि वहां कोई पुल था ही नहीं और नदी समंदर की तरह दिखने लगी। इदुक्की में एनडीआरएफ़ के अधिकारियों का कहना है कि कन्हैया ने नवजात को सुरक्षित निकालने में महज 26 सेकंड का वक़्त लिया।
बीबीसी तमिल ने कन्हैया से बात की। कन्हैया अभी केरल में सोशल मीडिया के लिए सनसनी बने हुए हैं। कन्हैया कुमार बिहार के हैं। स्कूल की पढ़ाई ख़त्म करने के बाद ही कन्हैया ने नौकरी के लिए प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी थी। कन्हैया ने ग़रीबी के कारण यह फ़ैसला लिया था ताकि माता-पिता और तीन भाइयों वाले परिवार का खर्च चल सके। कन्हैया पिछले 6 महीने से एनडीआरएफ़ में हैं।
कन्हैया ने कहा, ''मैंने सरकारी नौकरी परिवार की मदद के लिए हासिल की। मेरे दो और भाई सेना में हैं। एक कश्मीर में है। हम लोगों की मुलाक़ात बड़ी मुश्किल से होती है। हमारे माता-पिता को अपने बेटे के काम पर गर्व है। केरल में जो भी बाढ़ की त्रासदी से प्रभावित हैं वो सारे मेरे परिवार हैं।'' केरल में बाढ़ की आपदा और राहत बचाव पर कन्हैया कुमार ने कहा, ''हमलोगों को पता था कि हम केरल में बाढ़ में फँसे लोगों को निकालने जा रहे हैं। जब हम यहां पहुंचे तो ऐसा लगा कि जो सोचकर आए थे उससे ज़्यादा करने की ज़रूरत है।''
''इदुक्की ज़िले में भूस्खलन सबसे ज़्यादा होता है। इस नदी में 26 साल बाद बाढ़ आई है। यहीं पर एक बस स्टॉप था जिसका नामो-निशान मिट गया है। नारियल की खेती भी बर्बाद हो गई है।''
एनडीआरएफ़ के एक और सदस्य कृपाल सिंह ने भी केरल में बाढ़ और राहत बचाव कार्य को लेकर बीबीसी तमिल से बात की। उन्होंने कहा, ''प्राकृतिक आपदा से जुड़ी ज़्यादातर भविष्यवाणियां ग़लत साबित होती हैं। हमलोग किसी भी स्थिति का सामना करने के लिए तैयार रहते हैं। यही हमारा मंत्र भी है। कई जगहों पर तो तत्काल राहत पहुंचाना बहुत मुश्किल होता है। हमारे काम से लोगों के बीच उम्मीद जगी है। लोगों ने भी हमलोग के साथ काम करना शुरू कर दिया है।''