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हिंद महासागर के बीचों-बीच बना एक द्वीप, काला पानी के काले इतिहास का गवाह

Tue, 13 Mar 2018 09:10 AM IST
फीचर डेस्क, अमर उमजाला
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- फोटो : NEELIMA VALLANGI
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आज आप को ले चलते हैं एक भुतहे जजीरे की सैर पर। ये भुतहा द्वीप अंडमान निकोबार द्वीप समूह का हिस्सा है। हिंद महासागर में स्थित अंडमान निकोबार द्वीप समूह में कुल 572 द्वीप हैं। इनमें से केवल 38 में ही लोग रहते हैं। समंदर से नजदीकी की बात करें, तो अंडमान निकोबार के द्वीप भारत के बजाय दक्षिण पूर्व एशिया से ज्यादा करीब हैं।

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अंडमान के द्वीप अपने खूबसूरत समुद्र तटों, कुदरती दिलकशी, अनछुए जंगलों, दुर्लभ समुद्री जीवों और मूंगे की चट्टानों के लिए मशहूर हैं।

काला पानी के काले इतिहास का गवाह
इस खूबसूरती के पर्दे के पीछे छुपा है अंडमान का काला इतिहास। अंडमान का एक द्वीप रॉस आइलैंड अपने भीतर साम्राज्यवादी इतिहास के काले-घने राज छुपाए हुए है। यहां पर उन्नीसवीं सदी के ब्रिटिश राज के खंडहर, इस द्वीप और हिंदुस्तान के एक काले अध्याय के गवाह के तौर पर मौजूद हैं।

रॉस आइलैंड में शानदार बंगलों, एक विशाल चर्च, बॉलरूम और एक कब्रिस्तान के खंडहर हैं, जिनकी हालत दिन-ब-दिन खराब हो रही है। तेजी से बढ़ रहे जंगल, इन खंडहरों को अपने आगोश में ले रहे हैं।

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क्यों चुना गया रॉस आइलैंड को?

- फोटो : NEELIMA VALLANGI
1857 में भारत की आजादी के पहले संग्राम के बाद ब्रिटिश साम्राज्य ने बागियों को अंडमान के सुदूर द्वीपों पर लाकर कैद रखने की योजना बनाई। 1858 में 200 बागियों को लेकर एक जहाज अंडमान पहुंचा।

उस वक्त सारे के सारे द्वीप घने जंगलों से आबाद थे। इंसान के लिए वहां रहना मुश्किल था। महज 0।3 वर्ग किलोमीटर के इलाके वाला रॉस आइलैंड इन कैदियों को रखने के लिए चुना गया पहला जजीरा था। इसकी वजह ये थी कि यहां पर पीने का पानी मौजूद था। लेकिन इस द्वीप के जंगलों को साफ करके इंसानों के रहने लायक बनाने की जिम्मेदारी उन्हीं कैदियों के कंधों पर आई। इस दौरान ब्रिटिश अधिकारी जहाज पर ही रह रहे थे।

रॉस आइलैंड को आबाद किया गया
धीरे-धीरे अंग्रेजों ने अंडमान में और राजनैतिक कैदियों को लाकर रखना शुरू कर दिया। और जेलें और बैरकें बनाने की जरूरत पड़ी। इसके बाद ब्रिटिश अधिकारियों ने रॉस आइलैंड को अंडमान का प्रशासनिक मुख्यालय बनाने की ठानी। बड़े अफसरों और उनके परिवारों के रहने के लिए रॉस आइलैंड को काफी विकसित किया गया। अंडमान के द्वीपों पर बहुत सारी बीमारियां फैलती रही थीं।

इससे अंग्रेज अधिकारियों और उनके परिजनों को बचाने के लिए रॉस आइलैंड में बेहद खूबसूरत इमारतें बनाई गईं। शानदार लॉन विकसित किए गए। बढ़िया फर्नीचर से बंगले आबाद हुए। टेनिस कोर्ट भी बनाए गए। बाद में यहां एक चर्च और पानी साफ करने का प्लांट भी बनाया गया। इसके अलावा रॉस आइलैंड पर सेना के बैरक और एक अस्पताल भी बनाया गया।

बाद में डीजल जेनरेटर वाला एक पावरहाउस भी यहां बनाया गया ताकि यहां आबाद लोगों के लिए रौशनी का इंतजाम हो सके। इन सुविधाओं की वजह से रॉस आइलैंड चारों तरफ बिखरे तबाही के मंजर के बीच चमकता सितारा बन गया।

लेकिन फिर रॉस आइलैंड सुनसान हो गया

- फोटो : NEELIMA VALLANGI
लेकिन, 1942 तक रॉस आइलैंड सुनसान हो चला था। क्योंकि सियासी वजहों से अंग्रेजों को 1938 में सभी राजनैतिक बंदियों को अंडमान से रिहा करना पड़ा था। फिर दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जापान के हमले की आशंका के चलते अंग्रेज यहां से भाग खड़े हुए।

हालांकि युद्ध के खात्मे तक मित्र सेनाओं ने अंडमान निकोबार पर फिर से कब्जा कर लिया था। जब 1947 में भारत आजाद हुआ तो अंडमान निकोबार भी इसका हिस्सा बने। इसके बाद लंबे वक्त तक रॉस आइलैंड को उसके हाल पर ही छोड़ दिया गया। 1979 में एक बार फिर भारतीय नौसेना ने इस द्वीप पर कब्जा कर लिया।

आज क्या है रॉस आइलैंड की स्थिति?
रॉस आइलैंड के अनछुए खंडहर इसके काले और घिनौने इतिहास की गवाह हैं। उसकी झलक दिखाते हैं। यहां के बाजार अब वीरान हैं। बहुतेरी इमारतों की नुकीली छतें ढह चुकी हैं। कांच की खिडकियां चूर-चूर हो चुकी हैं।

बिना छतों वाले बंगलों के खंडहरों के कंकाल उन बुजुर्गों की तरह लगते हैं, जो अपने गुजरे हुए अतीत की कहानी सुनाने को बेताब हैं, मगर कोई सुनने वाला नहीं। आज चर्च की दीवारें हों या कब्रिस्तान की चारदीवारी, क्लब का खंडहर या फिर प्रशासनिक इमारत की खिड़कियां, सब पर गूलर के बढ़ते दरख्तों का कब्जा हो गया है।
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आज हिरन, खरगोश मोर हैं बाशिंदे

- फोटो : NEELIMA VALLANGI
बीसवीं सदी की शुरुआत में ब्रिटिश अधिकारियों ने अंडमान के द्वीपों पर ला कर हिरनों की कुछ प्रजातियों को बसाया था। इन्हें द्वीप पर लाने का मकसद था, शिकार के खेल के लिए जानवर मुहैया कराना।

लेकिन, हिरनों को खाने वाले जानवर न होने से इनकी आबादी बेतहाशा बढ़ गई। इसकी वजह से अंडमान के द्वीपों में पेड-पौधों को बहुत नुकसान हुआ। क्योंकि, हिरन नए, छोटे पौधों को खा जाते थे। आज ये हिरन, खरगोश और मोर ही रॉस आइलैंड के बाशिंदे हैं। यहां आने वाले सैलानियों के लिए ये जानवर दिलकश नजारे पेश करते हैं।

अब यह द्वीप कुदरत के आसरे
जूनियर अफसरों का दिल बहलाने के लिए बनाए गए सब-ऑर्डिनेट क्लब का लकड़ी का फर्श अभी भी काफी हद तक बचा हुआ है। एक दौर ऐसा रहा होगा, जब यहां गीत-संगीत की धुनों पर लोग थिरकते रहे होंगे। लेकिन आज सिर्फ परिंदों की चहचहाहट ही यहां के खंडहरों के बीच गूंजने वाली इकलौती आवाज है।

अंडमान में काले पानी की सजा वाली जेल को बंद हुए आठ दशक से ज्यादा वक्त बीत चुका है। इसके साथ ही भारत के इतिहास के एक काले अध्याय पर भी पर्दा गिरा था। आज रॉस आइलैंड के खंडहर उस गुजर चुके काले इतिहास के दाग के तौर पर हिंद महासागर में मौजूद हैं। ये हमें उस भविष्य की दिखलाते हैं, जब इंसानी सभ्यता का खात्मा हो जाएगा और कुदरत उन इलाकों पर दोबारा अपना हक जमाएगी जो कभी मानवता के लिए अहम ठिकाने थे।
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