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इंसानी खून पीने वाले लोगों की दुनिया का पूरा सच

कभी ऐसे लोगों के बारे में सुना है जो एक-दूसरे का खून पीते हैं? नहीं ना? अमेरिका समेत दुनियाभर के कई हिस्सों में 'वैंपायर' नाम का बड़ा प्रचलन है। ये वहां के किस्से-कहानियों में चर्चित ऐसे चरित्र हैं जो लोगों को बड़े दंग करने वाले लगते हैं।

इनके पास अनूठी ताकतें होती हैं और ये खाना-पीना ना खाकर, बल्कि इंसानी या जानवरों के खून को पीकर जिंदा रहते हैं। अब इसे चरित्रों के प्रति लोगों की उत्सुकता कहें या पागलपन, पर इन्हीं के जैसे असल में कई लोग हैं जो खुद को वैंपायर मानते हैं और इंसानी खून पीते हैं।
ऐसे लोगों के छोटे-बड़े कई समूह अमेरिका, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में हैं। ये लोग ज्यादातर खुद को 'गौथ कैंप' का बोलते हैं। बीबीसी के मुताबिक लुजियाना स्टेट युनिवर्सिटी के शोधकर्ता जॉन एडगर ने अमेरिका के न्यूऑर्लियंस के रियल वैंपायर कंम्यूनिटी को करीब से जाना और उनकी जिंदगी को साझा किया।

इंसानी वैंपायर का व्यवहार अजीब

जॉन एडगर ने बताया उन्होंने रियल वैंपायरों के एक फी‌डिंग प्रोग्राम में हिस्सा लिया। उन्होंने बताया कि ये एक ऐसा प्रोग्राम होता है जहां सभी वैंपायर मिलते हैं। वहां कई डोनोर (खून पिलाने वाले) भी होते हैं। 
खून पीने के लिए वैंपायर अपने डोनोर के पास जाते हैं। वो डोनोर के पीठ के ऊपरी हिस्से पर छोटा सा कट लगाते हैं और ‌फिर अपने दानव जैसे दांतों से वहीं से डोनोर का खून पीते हैं। जॉन ने बताया कि इन लोगों का व्यवहार अलग सा होता है। 
खून पीने को वो कामेच्छा की पूर्ति से जोड़ते हैं। कई वैंपायरों का अपने डोनर के साथ शारीरिक संबंध भी होते हैं। इनमें ऐसे कई वैंपायर हैं जो कहते हैं कि वो अपनी इस आदत को फैशन या संयोग नहीं मानते। बल्कि स्वस्‍थ रहने के बावूजद भी जब तक उन्हें खून पीने को नहीं मिलता तब तक उन्हें पेट दर्द और तनाव रहता है।

खून पिलाने को लेकर मौजूद है इतिहास

ऐसा नहीं है कि रियल वैंपायरों की पूरी अवधारणा बिल्कुल नई है। इतिहास के पन्नों में भी इनसे जुड़ी बातें सुनने को मिलती रही हैं। 15वीं शताब्दी में सातवें पोप इनोसेंट के चिकित्सक ने अपने मरते मास्टर की जान बचाने के लिए तीन नौजवानों को मौत के घात उतरवा दिया। ऐसा माना गया कि उन नौजवानों का खून पोप को पिलाकर उनकी जान बचाई जा सकती है। 
युनिव‌र्सिटी ऑफ डुरहम के रिचर्ड सग के मुताबिक पहले के जमाने में खून पिलाकर एपिलेप्सी या मिर्गी को ठीक करने के प्रमाण पाए हैं। मिर्गी के मरीजों को ऐसे गुनहगारों का खून पीने को कहा जाता था जिन्हें सजा मिलने वाली होती थी। ऐसा माना जाता था कि खून पीने का शरीर और आत्मा से बड़ा संबंध है। इस खून को पीने के बाद बीमारी से ग्रसित व्यक्ति की आत्मा स्वस्‍थ हो जाएगी। ऐसा इसलिए क्योंकि वो खून किसी जवान गुनाहगार का होगा।
जॉन एडगर ने कुछ वैंपायरों से मुलाकात के बाद देखा कि उनकी आदतें अजीब हैं। उनमें से कई तो ताबूतों में सोते हैं। अपने दांतों को जानबूझकर किसी दानव सा बनाते हैं। भूतों पर विश्ववास नहीं रखते और उनमें से कुछ को समाज और साहित्य की जानकारी आम लोगों से ज्यादा ही होती है।

आम जीवन में आम ही बने रहते हैं वैंपायर

रियल वैंपायर दिन के चौबीस घंटे खून-पीने वाले दानव जैसे ही जिए, ऐसा नहीं होता। दिन के वक्त इनका जीवन भी किसी आम इंसान सा होता है। वो पेशे से नर्स हो सकते हैं, बार में काम करने वाले स्टाफ या फिर ऐसे लोग भी जिनका भगवान में विश्वास तगड़ा होता है। जरूरी नहीं ये हमेशा बस श्मशानों के आस-पास घूमते रहें या फिर खून ही पीते रहें।
कई रियल वैंपायर मानवता को समर्पित कई संस्‍थानों के लिए भी काम करते हैं। वो बेघरों को खाना खिलाते हैं आदि। बस, अलग ये बात होती है कि वो खुद की पूर्ति अनोखे ढंग से करते हैं। वो मानते हैं कि अंदरूनी ताकत और शांति के ‌लिए खून की जरूरत होती है। इसके बगैर वो रह नहीं पाते। 
ऐसे कुछ वैंपायर है जिन्होंने माना कि खून की छोटी-छोती सात खुराक या छोटा कप उनके पाचन तंत्र को ठीक रखता है।

इंफेक्‍शन का होता है बड़ा खतरा

अब किसी इंसान का किसी दूसरे इंसान का खून पीना अपने आप में काफी अजीब है। चुंबन के दौरान ही दो लोगों में आपस में कई करोड़ों बैक्टीरिया का आदान-प्रदान होता है। ऐसे में खून पीना और पिलाना कहीं ज्यादा खतरनाक होता है।
हालांकि सभी वैंपायर अपना डोनोर चुनने से पहले क्लिनिक में जाकर खून की पूरी जांच करवाते हैं। खून पिलाने से पहले वो इस बात से आश्वस्त होते हैं कि वैंपायर पार्टी अपने मुंह को माउथ वॉथ से साफ कर ले।
फिर भी लॉस एंजेल्स के युनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के थॉमस गैंज ने बताया कि सुरक्षा लेने के बाद भी ये प्रक्रिया सुरक्षित नहीं कही जा सकती। ऐसे क्लिनिक जो इन्हें पूर्ण तरीके से स्वस्‍थ करार देने के बाद भी बड़ी बीमारियों से मुक्ति के वादे नहीं करती। 
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डॉक्टरों से दूर ही रहना पसंद करते हैं ये वैंपायर

अपनी जिंदगी के बारे में आगे साफ तौर से बताते हुए वैंपायरों ने बताया कि वो किसी भी तकलीफ में डॉक्टरों के पास जाने से कतराते हैं। सच्चाई पता चलने पर कि वो असल में वैंपायर हैं, डॉक्टरों की टीम उन्हें पुलिस के हवाले या उनके बच्चों को सरकार के हवाले करने में लग जाती है।
एक वैंपायर ने बताया कि उसने बिना खून पिए कुछ समय जीने की सोची। लेकिन ऐसा करने पर उनकी धड़कने तेज हो गई और उन्हें घबराहट में अस्पताल ले जाना पड़ गया। वहां कई दिनों तक रहने के बाद भी वो ठीक नहीं हुए। लगभग चार महीने के बाद उन्होंने खून को फिर से पिया और तब जाकर उन्हें ऐसा लगा कि उनकी जिंदगी लौट आई।
तो वैज्ञानिकों के मुताबिक खून पीने की वैंपायरों की आदत दिमागी भी है। उन्हें लगता है कि खून की पूर्ति खून से ही हो सकती है। वहीं कई वैंपायरों का मानना है कि उन्हें खून की जरूरत तब से महसूस हुई जब वो किशोरावस्‍था में आए। 
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