बता दें, एम्मा का यह फोबिया 12 साल पहले ही अपने चरम पर पहुंच गया था। हालांकि, उन्हें बचपन से ही उल्टी आना शुरू हो गए थे, लेकिन तब उनके लिए यह बीमारी इतनी जटिल नहीं बनी थी। उन्होंने बताया कि कभी-कभी तो घर में ही होते हुए उन्हें एमेटोफोबिया का अटैक आ जाता है।
उनके मुताबिक ज्यादातर लोग उनकी बीमारी को देखकर भयभीत होते हैं, लिहाजा उन्होंने खुद घर से बाहर नहीं निकलने का फैसला किया। एम्मा कहती हैं कि इतना अधिक अवसाद होता है कि वो शायद ही अपने कमरे से निकलती हैं। उनके लिए अब बाहर जाने का कोई मतलब नहीं है क्योंकि उन्हें ऐसा लगता है कि बाहर जाकर घूमने से अधिक खुशी घर में कैद होकर मिलेगी। बीमारी की वजह से वे हर एक मिनट दिक्कतों का सामना करती हैं।
एम्मा बताती हैं कि जब वे 23 साल की थीं तब उन्हें पता चला कि वे इस तरह की बीमारी का सामना कर रही हैं। उन्होंने कहा, ‘मुझे काम पर घबराहट के दौरे पड़ने लगे, जिससे मैं थोड़ा डर गई। काम पर जाते समय बस में भी यही दिक्कत होती थी क्योंकि मैं बीमार महसूस करती थी। इस वजह से मुझे काम छोड़ना पड़ा, जो कठिन था क्योंकि मैंने स्कूल छोड़ने के बाद से ही काम करना शुरू कर दिया था।’
एम्मा ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में उनके हालात और बदतर होते गए और फिर एक समय ऐसा भी आया जब एक ही दिन में उन्हें छह पैनिक अटैक आने लगे। उन्होंने बताया कि उन्हें ये पैनिक अटैक रोजमर्रा के मामूली कामों से भी आने लगे, जो ज्यादातर लोग आराम से कर लेते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि अपनी स्थिति से उबरने के लिए उन्होंने कई तरह के इलाज करवाए व मनोचिकित्सा के विभिन्न रूपों को अपनाया, लेकिन इन सब के बावजूद ये बीमारी ठीक नहीं हुई। ऐसे में वे घर में ही रहने को मजबूर हैं।