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दुनिया के सबसे पुराने रेगिस्तान के अनसुलझे रहस्य, यहां मौजूद हैं 'भगवान के पैरों के निशान'

Sun, 15 Dec 2019 10:37 AM IST
सोनू शर्मा फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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दुनिया का सबसे पुराना रेगिस्तान - फोटो : Social media
कुछ लोग मानते हैं कि वे देवताओं के पैरों के निशान हैं। दूसरों को लगता है कि वहां रात में परियां नाचती हैं। कुछ अन्य लोगों को शक है कि वहां यूएफओ आते हैं, लेकिन आज तक कोई भी नामीब रेगिस्तान पर बनी लाखों गोलाकार आकृतियों की व्याख्या नहीं कर पाया है। 
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नामीब रेगिस्तान - फोटो : Social media
दक्षिण-पश्चिमी अफ्रीका के अटलांटिक तट से लगा नामीब रेगिस्तान धरती पर सबसे सूखी जगहों में से एक है। स्थानीय नामा भाषा में इसका अर्थ है- 'वह इलाका जहां कुछ भी नहीं है।' मंगल ग्रह की सतह जैसा दिखने वाले इस भू-भाग पर रेत के टीले हैं, ऊबड़-खाबड़ पहाड़ हैं और तीन देशों के 81 हजार वर्ग किलोमीटर में फैले बजरी के मैदान हैं। 
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नामीब रेगिस्तान - फोटो : Social media
पांच करोड़ 50 लाख साल पुराने नामीब रेगिस्तान को दुनिया का सबसे पुराना रेगिस्तान माना जाता है। सहारा रेगिस्तान सिर्फ 20 से 70 लाख साल पहले का है। गर्मियों में यहां तापमान अक्सर 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है और रातें इतनी ठंडी होती हैं कि बर्फ जम जाए। बसने के लिहाज से यह धरती के सबसे दुर्गम इलाकों में से एक है, फिर भी कई प्रजातियों ने इसे अपना घर बनाया है।

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नामीब रेगिस्तान - फोटो : Social media
नामीब रेगिस्तान दक्षिणी अंगोला से नामीबिया होते हुए 2,000 किलोमीटर दूर दक्षिण अफ्रीका के उत्तरी हिस्से तक फैला है। नामीबिया के लंबे अटलांटिक तट पर यह नाटकीय रूप से समुद्र से मिलता है। ऐसा लगता है मानो पूरब की ओर रेत का अंतहीन समुद्र फैला हो, जो दक्षिण अफ्रीका के 160 किलोमीटर अंदर विशाल ढलान तक जाता है। 
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नामीब रेगिस्तान - फोटो : Social media
नामीब रेगिस्तान के सबसे सूखे हिस्सों में साल में औसतन सिर्फ दो मिलीमीटर बारिश होती है। कई साल बिल्कुल बारिश नहीं होती। फिर भी ओरिक्स, स्प्रिंगबॉक (दोनों हिरण की प्रजातियां), चीता, लकड़बग्घा, शुतुरमुर्ग और जेब्रा ने यहां की कठोर परिस्थितियों में खुद को ढाल लिया है। शुतुरमुर्ग पानी के नुकसान को कम करने के लिए अपने शरीर के तापमान को बढ़ा लेते हैं। हार्टमैन के पहाड़ी जेब्रा कुशल पर्वतारोही हैं जिन्होंने रेगिस्तान के बीहड़ इलाकों में खुद को ढाल लिया है। ओरिक्स बिना पानी पिए सिर्फ पौधे की जड़ और कंद खाकर हफ्तों तक जिंदा रह सकते हैं। 
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नामीब रेगिस्तान - फोटो : Social media
नामीब रेगिस्तान का सबसे जानलेवा इलाका रेत के टीलों और टूटे हुए जहाजों के जंग खाए पतवारों से भरा हुआ है। अटलांटिक तट पर 500 किलोमीटर लंबे क्षेत्र में फैला यह इलाका कंकाल तट के नाम से जाना जाता है। दक्षिणी अंगोला से मध्य नामीबिया तक फैला यह इलाका व्हेल के अनगिनत कंकालों और लगभग 1,000 जहाजों के मलबे से पटा हुआ है, जो पिछली कई सदियों में यहां जमा हुए हैं। 
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नामीब रेगिस्तान - फोटो : Social media
यह कंकाल तट अक्सर घने कोहरे से ढंका रहता है, जो अटलांटिक की ठंडी बेंगुएला धारा और नामीब रेगिस्तान की गर्म हवाओं के टकराने से बनता है। समुद्री जहाजों के लिए इस कोहरे से पार पाना कठिन होता है। स्थानीय सैन लोगों का कहना है कि ईश्वर ने इस क्षेत्र को गुस्से में बनाया है। 

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नामीब रेगिस्तान - फोटो : Social media
1486 ईस्वी में अफ्रीका के पश्चिमी तट के किनारे-किनारे चलते हुए पुर्तगाल के मशहूर नाविक डियागो काओ कुछ समय के लिए कंकाल तट पर रुके थे। काओ और उनके लोगों ने वहां क्रॉस की स्थापना की, लेकिन कठिन परिस्थितियों में वे ज्यादा समय तक टिक नहीं पाए। जाते-जाते उन्होंने इस जगह को 'नरक का दरवाजा' नाम दे दिया। 

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नामीब रेगिस्तान - फोटो : Social media
सैलानी सोसुस्वेले के इर्द-गिर्द रेत के गेरुआ टीलों को देखने नामीब आते हैं। नमक और कीचड़ का यह पैन 50 हजार वर्ग किलोमीटर में फैले अफ्रीका के तीसरे सबसे बड़े राष्ट्रीय उद्यान के केंद्र में है। रेत के टीले तो नामीब में हर जगह हैं, लेकिन सोसुस्वेले के आसपास उनका रंग गहरे नारंगी रंग का है। यह रंग असल में जंग का है। यहां की रेत में लोहे की सांद्रता काफी अधिक है, जिसका ऑक्सीकरण होता रहता है। यहां के रेत के कुछ टीले दुनिया में सबसे ऊंचे हैं। कुछ टीलों की ऊंचाई 200 मीटर तक है। सोसुस्वेले के उत्तर में एक टीला तो करीब 400 मीटर ऊंचा है। 

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नामीब रेगिस्तान - फोटो : Social media
नामीब की हैरान कर देने वाली कई पहेलियों में सबसे बड़ी पहेली एक भू-आकृति है जिसे 'परियों का घेरा' कहा जाता है। एक खास प्रजाति के घास से घिरे गोल-गोल घेरों में कोई पौधा नहीं होता। पूरे नामीब रेगिस्तान में ऐसे लाखों घेरे हैं जो कई दशकों से विशेषज्ञों को चकित किए हुए हैं। इन घेरों को आसमान से देखना सबसे अच्छा है। नामीब के अंतहीन रेगिस्तान में हर जगह ये घेरे दिखते हैं, जो कई बार चेचक के धब्बों की तरह लगते हैं। 

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नामीब रेगिस्तान - फोटो : Social media
ये घेरे बजरी के मैदानों में भी मिलते हैं और रेत के टीलों पर भी। हर जगह उनकी संरचना गोल ही रहती है। सेंट्रल नामीब में घेरे का व्यास 1.5 मीटर से 6 मीटर तक होता है। उत्तर-पश्चिमी नामीबिया में वे इससे चार गुना तक बड़े हो सकते हैं। वहां घेरों का व्यास 25 मीटर तक हो सकता है। वर्षों तक यही समझा जाता रहा कि परियों के ये छल्ले सिर्फ नामीबिया में हैं। 2014 में पर्यावरण वैज्ञानिक ब्रॉनविन बेल ने पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के पिलबारा क्षेत्र में भी ऐसे ही घेरे ढूंढे। इन शानदार आकृतियों से हैरान होकर बेल ने जर्मनी के पारिस्थितिकी वैज्ञानिक विशेषज्ञ स्टीफन गेट्जिन से संपर्क किया और अपनी खोज साझा की। 

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नामीब रेगिस्तान - फोटो : Social media
ऑस्ट्रेलिया में मिले घेरे देखने में तो नामीबिया के घेरों जैसे ही हैं, लेकिन दोनों जगहों की मिट्टी की संरचना अलग है। इसने वैज्ञानिकों को और चकरा दिया। 'परियों' के घेरे की पहेली सुलझाने में विशेषज्ञ भले ही चकरा रहे हैं, लेकिन नामीबिया के स्थानीय लोगों को इन आकृतियों के बारे में बहुत पहले से पता था। स्थानीय हिम्बा लोगों का विश्वास है कि इन्हें आत्माओं ने बनाया है और ये उनके देवता मुकुरू के पैरों के निशान हैं। 

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नामीब रेगिस्तान - फोटो : Social media
आकृतियों के रहस्य को सुलझाने के लिए गणित के कुछ विशेषज्ञों ने मॉडल बनाकर यह समझने की कोशिश की कि क्या ये रिंग किसी पैटर्न में बनते हैं। लेकिन नामीब-नौक्लुफ्ट राष्ट्रीय उद्यान के बाहर रोस्टॉक रिट्ज डेजर्ट लॉज के मालिक हेन शुल्ट्ज का कहना है कि स्थानीय लोग मानते हैं कि ये रहस्यमय आकृतियां यूएफओ या रात में परियों के नाचने से बनती हैं। आज तक इन घेरों की व्याख्या करने वाला कोई सर्वमान्य सिद्धांत सामने नहीं आया है। हाल के वर्षों में नामीबिया, जर्मनी, अमेरिका और अन्य देशों के वैज्ञानिकों ने एक साथ इन पर काम शुरू किया है। 

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नामीब रेगिस्तान - फोटो : Social media
रेगिस्तान के बीच में बने गोबाबेब-नामीब रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिक यूजीन मारैस का कहना है कि नामीब में पानी की घोर कमी से दो प्रमुख सिद्धांत सामने आते हैं। कुछ शोध बताते हैं कि ये घेरे दीमक के कारण बने हैं, जो जमीन से पानी और पोषक तत्वों को तलाशते रहते हैं। पौधे की जड़ों को खाकर वे जमीन के नीचे खाली जगह बना देते हैं, जिससे बारिश के पानी को धरती के अंदर तक पहुंचने में आसानी होती है। इस सिद्धांत के मुताबिक दीमक भूमिगत स्रोतों से पानी पीकर पूरे साल जीवित रहते हैं। 

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नामीब रेगिस्तान - फोटो : Social media
दूसरा सिद्धांत यह है कि वनस्पतियां खुद यह प्रबंधन करती हैं। घास के पौधों को भी पानी और पोषक तत्वों की जरूरत होती है। उनकी जड़ें इसके लिए एक दूसरे से होड़ करती हैं। बंजर गोलाकार क्षेत्र जलाशय की तरह काम करता है, जहां से वे पानी और पोषक तत्व लेते हैं। वर्षों के सूखे के बाद घास सूख जाते हैं और धीरे-धीरे खत्म हो जाते हैं। मारैस एक और पहेली के बारे में बताते हैं। वह यह कि जब भी बारिश होती है तो अचानक जादू की तरह ये घेरे फिर से प्रकट हो जाते हैं। 
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नामीब रेगिस्तान - फोटो : Social media
मारैस के मुताबिक, नामीब के इन परी घेरों पर हुए शोध मुख्य रूप से बजरी के मैदानों या रेत के टीलों पर मिले घेरों पर केंद्रित रहे हैं। इन आकृतियों को पूरी तरह समझने के लिए उनको लगता है शोध को एक साथ दोनों जगह ध्यान देने की जरूरत है। मारैस को लगता है कि ये रहस्यमय घेरे एक नहीं, बल्कि कई वजहों से बनते हैं, लेकिन वे वजह क्या हैं ये अब तक रहस्य है।
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