कुछ दिनों पहले ही आपने पढ़ा होगा कि दुनिया की सबसे पहली सौर-ऊर्जा से संचालित विमान दुनिया की सैर पर निकल गई है।
डेली मेल के मुताबिक जहां ये बात हमारे लिए अचरज भरी और उतनी ही गौरव महसूस करने वाली है, वहीं हम लोगों को इस बात का शायद ही ज्ञान है कि इस विमान में दिन काटना किता दिक्कतों भरा है।
स्विस एक्सप्लोरर बर्टट्रैंड पिकाक और आंद्रे बोर्शबर्ग दोनों ही इस विमान को उड़ा रहे हैं। वो कहते हैं कि उन्हें बिना रूके पांच दिनों तक प्लेन उड़ाना था, ये सबसे बड़ा चैलेंज था।
कॉकपिट में नहीं है बिल्कुल भी जगह
आंद्र कहते हैं कि सौर-ऊर्जा से संचालित इस विमान में जगह की भारी कमी है। जगह इतनी भी नहीं कि कोई चाहे तो पैर फैलाकर लेट ले।
कॉकपिट इतना नन्हा सा है कि वहां कोई पायलट खड़े भी नहीं हो सकते। चलना-फिरना तो दूर की बात। ये तब बड़ी मुसीबत सी दिखती है जब आपको पांच दिनों तक बैठे ही रहना होता है।
सोने के लिए अड़स-अड़स कर ठूसी हुई सी मुद्रा में सोना होता है। ऐसे में पक्की नींद आ पाना भी दिक्कत ही है।
टॉयलेट का मतलब सिर्फ एक सीट
बर्टट्रैंड ने कहा कि टॉयलेट लगना भी वहां किसी बदकिस्मती से कम नहीं है। क्योंकि टॉयलेट के नाम पर केवल एक छोटी सी सीट है ।
इस सीट पर छोटा सा होल है। इसके ऊपर बैठने वाले को बड़े ध्यान से मल-मूत्र पास करना होता है। ये भी कि विमान में जरा भी कोई चीज अत्यधिक या फैली नहीं होनी चाहिए।
हां, उसमें नहाया नहीं जा सकता। ऐसा इसलिए क्योंकि जगह जरा भी नहीं कि बाथरूम जैसा कुछ बनाया जा सके। खाना पायलट लेकर चले थे। ये काफी दिक्कतों भरा पर यादगार और चैलेंजिंग सफर रहा।