सन 1845 में लंदन के अखबार, 'इलस्ट्रेटेड लंदन न्यूज' में अजीबो-गरीब खबर छपी। खबर ये थी कि काले रंग के एक बेहद खूबसूरत कुत्ते ने पानी में कूदकर जान दे दी। जब वो पानी में कूदा तो उसने तैरने के लिए पैर मारने की कोशिश तक नहीं की, जबकि आम तौर पर कुत्ते ऐसा नहीं करते। जब उस कुत्ते को पानी से निकालकर बाहर लाया गया तो वो दोबारा पानी में कूद गया और अपनी जान देकर ही माना।
उस दौर के अखबारों के मुताबिक, किसी जानवर के खुदकुशी करने की ये पहली घटना नहीं थी। इसके कुछ दिनों बाद ही दो ऐसी और खबरें छपीं। जिनमें से एक में बतख ने खुद को डुबोकर मार डाला था। वहीं दूसरी खबर के मुताबिक, एक बिल्ली ने पेड से लटककर जान दे दी। ऐसा बिल्ली ने अपने बच्चों की मौत के बाद किया था।
आखिर इन खबरों में कितनी सच्चाई है? हमें ये तो मालूम है कि जानवर भी दिमागी बीमारी के शिकार होते हैं। हमें ये भी पता है कि इंसानों की तरह कई जानवर भी तनाव और डिप्रेशन के शिकार हो जाते हैं। इंसान अक्सर इन्हीं वजहों से खुदकुशी करता है। इंसानों जैसी कई आदतें दूसरे जानवरों में पाई गई हैं, लेकिन क्या आत्महत्या उनमें से एक है? क्या वाकई जानवर, जान-बूझकर अपनी जान देते हैं?
जानवरों की तकलीफ को इंसानों जैसी
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इंसान इस सवाल का जवाब बरसों से तलाश रहा है। आज से दो हजार साल पहले यूनानी दार्शनिक अरस्तू ने एक घोडे के खुदकुशी करने की घटना का जिक्र किया था। उनके मुताबिक, जब घोडे को लगा कि उसने अपनी मां के साथ सेक्स कर लिया है तो मारे शर्म के उसने खुद को समंदर में डुबोकर मार डाला।
ईसा की दूसरी सदी में ग्रीक विचारक क्लॉडियस ऐलियन ने तो जानवरों की खुदकुशी की वारदात पर पूरी किताब ही लिख डाली थी। उन्होंने इसमें जानवरों की आत्महत्या की 21 वारदातों की मिसालें दी थीं। इनमें एक डॉल्फिन की खुदकुशी की घटना का भी जिक्र था। जिसने जान-बूझकर खुद को पकडवाया था। इसके अलावा कुछ शिकारी कुत्तों के खाना छोडकर जान देने की घटनाओं के बारे में भी क्लॉडियस ने लिखा। कुत्तों ने अपने मालिक के मर जाने के बाद ऐसा किया था।
एक ऐसी ही वारदात में एक बाज के अपने मालिक की चिता में जल जाने की घटना का भी जिक्र क्लॉडियस ने किया है। उन्नीसवीं सदी में इंग्लैंड में जानवरों की खुदकुशी को लेकर लोगों में काफी दिलचस्पी थी। विलियम लॉडर लिंडसे नाम के एक मनोवैज्ञानिक ने लिखा कि जानवर तकलीफ की हालात से बचने के लिए जान दे देते हैं।
उस दौर में जानवरों की बेहतरी के लिए काम करने वाले संगठनों ने भी इस मुद्दे पर काफी जोर दिया था। रॉयल सोसाइटी फॉर प्रिवेंशन ऑफ क्रुएल्टी टू एनिमल्स नाम के संगठन ने तो जानवरों की तकलीफ को इंसानों जैसा बताने की भी कोशिश की।
जानवर जान बूझकर जान नहीं देते
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ब्रिटेन की मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी के डंकन विलसन ने 2014 में इस बारे में अपनी रिसर्च छपवाई थी। वो कहते हैं कि उन्नीसवीं सदी के जानवर प्रेमी ये साबित करने में लगे थे कि जानवरों में भी एहसास होते हैं। तभी वो तकलीफ या गुस्से में आकर जान दे देते हैं।
वो 1875 की एक घटना की मिसाल देते हैं। जिसमें एक बारहसिंघे की खुदकुशी का जिक्र है, जिसे कुछ कुत्ते खदेड रहे थे। जब बारहसिंघे को लगा कि वो कुत्तों के जबडों की पहुंच में आने वाला है तो उसने खाई में छलांग लगाकर जान दे दी। हालांकि बीसवीं सदी में साइंस की तरक्की के बाद जानवरों के जान देने की घटनाओं को बढा-चढाकर पेश करने का दौर खत्म हो चुका है। तब खुदकुशी को बहादुरी की निशानी माना जाता था। आज आत्महत्या को सामाजिक बुराई कहा जाता है।
हालांकि जानवरों की खुदकुशी का सवाल जस का तस है। इस बारे में इटली की कैग्लियारी यूनिवर्सिटी के एंतोनियो प्रेती ने काफी रिसर्च की है। वो कहते हैं कि जानवर के खुदकुशी करने का खयाल ही गलत है। उन्होंने पिछले चालीस सालों में इस बारे में छपे करीब एक हजार रिसर्च को खंगाला। प्रेती अब इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि जानवर जान बूझकर जान नहीं देते।
तनाव में आने का जानवरों पर बुरा असर पडता है
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वो कहते हैं कि ग्रीक किस्से कहानियों में जानवरों की खुदकुशी का जो जिक्र मिलता है, वो महज गल्प कथा है। ध्रुवों पर पाए जाने वाले चूहों जैसे जानवर, लेमिंग्स, एक साथ झुंड के झुंड जाकर खाई में गिर जाते हैं। पहले कहा जाता था कि वो खुदकुशी करते हैं।
मगर अब वैज्ञानिकों का कहना है कि वो असल में गलती से गिर जाते हैं। जनसंख्या का इतना दबाव होता है कि लेमिंग्स हजारों की तादाद में एक साथ ही एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं। इसी सफर के दौरान उनमें से बहुतों की मौत हो जाती है।
कई बार मालिकों की मौत के बाद पालतू जानवरों की मौत को खुदकुशी माना जाता है। मगर एंतोनियो प्रेती के मुताबिक, मालिकों की मौत के बाद पालतू जानवरं की रोजमर्रा की जिंदगी में खलल पडता है। वो जान-बूझकर मरने का फैसला नहीं करते। असल में वो अपने मालिक के इतने आदी हो चुके होते हैं कि दूसरों के हाथ से खाना नहीं खाते। इस वजह से उनकी मौत हो जाती है।
इस तर्क से एक बात तो साफ है। बहुत तनाव में आने का जानवरों पर बहुत बुरा असर पडता है।
जानवरों के जान देने की वजह उनकी जिंदगी में इंसान की दखलंदाजी है
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इस साल मई में स्पेन के टेनेराइफ में एक सी वर्ल्ड वाटर पार्क में अजीबो-गरीब घटना हुई। यहां पालतू रखी गई एक किलर व्हेल अपने टैंक से बाहर आकर करीब दस मिनट तक पडी रही। देखने वालों ने इसे व्हेल के खुदकुशी करने की कोशिश के तौर पर देखा।
हालांकि जानकार कहते हैं कि व्हेल अपने माहौल से परेशान थी। कहां समंदर, जिसका कोई ओर-छोर नहीं होता। और कहां वो वाटर पार्क के टैंक की पाबंदियों में तैरने को पाती थी। इसी से उसे तनाव हो गया था। उसके पानी से बाहर आने की यही वजह थी।
अमरीका के विलियम एंड मैरी कॉलेज की बारबरा किंग कहती हैं कि पहले तो हमें ये समझना होगा कि जानवरों में एहसास किस हद तक होते हैं। क्या वो इतना महसूस कर पाते हैं कि जान देने का फैसला कर सकें? बारबरा कहती हैं कि ज्यादातर जानवरों के जान देने की वजह उनकी जिंदगी में इंसान की दखलंदाजी होती है। उन्हें जबरदस्ती बंधे हुए माहौल में रखा जाता है। उनका शिकार भी किया जाता है।
चीन में बाडे में रखे गए एक भालू ने अपने बच्चे को मारकर खुद भी जान दे दी थी। असल में उसके बच्चे को एक बेहद तकलीफदेह इंजेक्शन देकर उसके शरीर से पित्त निकाला गया था। बच्चे की तकलीफ मां से नहीं देखी गई। और उसे ज्यादा दर्द से बचाने के लिए मां ने अपने बच्चे को मार डाला। और खुद भी जान दे दी। जानकार कहते हैं कि मादा भालू को ये लगा कि वो मां-बेटे जिंदा रहे तो उन्हें आगे भी ऐसी तकलीफ झेलनी पडेगी।
व्हेल जान देने के लिए ही जान-बूझकर पानी के बाहर आती हैं
एंतोनियो प्रेती, भालू के बर्ताव को तनाव का नतीजा बताते हैं। वो कहते हैं कि बांध कर रखे जाने पर जानवर कैद से भागने की कोशिश करते हैं। नहीं भाग पाते तो जान दे देते हैं। व्हेलों के बारे में भी कहा जाता है कि वो जान देने के लिए ही जान-बूझकर पानी के बाहर आती हैं। जानकार कहते हैं कि कोई व्हेल बीमार पडने पर पानी से बाहर आ जाती है। अब चूंकि व्हेल सामाजिक जानवर है। तो उसका साथ देने के लिए कई और भी किनारे आ जाती हैं। हालांकि इसे खुदकुशी कहना गलत होगा।
कई बार कुछ परजीवी कीटाणुओं की वजह से भी जानवरों का दिमाग खराब हो जाता है। और उनकी मौत हो जाती है। जैसे कि चूहों के दिमाग पर असर डालने वाला एक विषाणु। इसके असर से चूहों के भीतर से बिल्लियों का डर खत्म हो जाता है। ऐसे बीमार चूहों को जब बिल्लियां खाती हैं। तो, उन्हें भी ये बीमारी हो जाती है। ऐसे ही कुकुरमुत्ते की एक नस्ल, कुछ चींटियों के दिमाग पर बुरा असर डालकर उन्हें मौत की तरफ धकेल देती है।
वहीं कुछ मकडियां, अपने आप को खाने के लिए बच्चों के हवाले कर देती हैं। इसे खुदकुशी के बजाय बच्चों की फिक्र में जान देना कहना ज्यादा सही होगा। खुदकुशी वो होती है जिसमें कोई इरादतन अपनी जान देता है। अब बहुत से जानवर अपनी जान देते हैं। मगर, क्या वो इरादतन ऐसा करते हैं? जैसे कि मादा मकडी, जो खुद को मिटाकर अपने बच्चों को जिंदा रखना चाहती है। वहीं चीन में जिस मादा भालू ने अपने बच्चे को मारकर जान दी। वो शायद तनाव में रही होगी। लेकिन, उसका इरादा जान देने का नहीं रहा होगा।
इंसान ही ऐसा जीव है जिसे अपनी मौत का बखूबी एहसास है
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अमरीकी एक्सपर्ट बारबरा किंग कहती हैं कि अभी हम जानवरों के दिमाग को ठीक से समझ नहीं पाए हैं। इसलिए इस सवाल का जवाब देना मुश्किल है कि क्या कुछ जानवर खुदकुशी करते हैं। खुदकुशी की तैयारी करना, इस दुनिया में हमारे हालात को समझना और उसके भविष्य के बारे में अंदाजा लगाना है।
इंसान ऐसा आसानी से कर पाते हैं। हम कई बार ऐसी बातों की फिक्र में भी लग जाते हैं जो हमारे नियंत्रण से बाहर होती हैं। लेकिन फिर भी उनकी चिंता हमें परेशान किए रहती है। ज्यादातर लोग इस फिक्र से समय के साथ बाहर आ जाते हैं। लेकिन डिप्रेशन के शिकार लोग ऐसा नहीं कर पाते। उन्हें भविष्य डरावना लगता है। जैसे कि हमारी मौत तय है। बहुत से लोग इस खयाल को पीछे छोडकर बिंदास जिंदगी जीते हैं। मगर कुछ लोग इसकी फिक्र जिंदगी भर करते रह जाते हैं।
कुछ जानवर भी इंसानों की तरह मौत का मातम मनाते हैं। वो अपने साथी की मौत पर सोग मनाते हैं। मुर्दा शरीर को देखकर डरते हैं। मगर ये नहीं कहा जा सकता है कि इन जानवरों को मौत से डर लगता है। उनमें इतनी समझ नहीं होती। यानी, जानवर बुरे हालात से घबराते हैं। यही वजह है कि जेब्रा, शेर के करीब नहीं जाते। उन्हें इसके खतरे का एहसास होता है। इससे डर लगता है। वरना मछलियां भी घडियालों के पास तैरतीं। चूहे, सांपों से आंखें मिलाकर बात करते।
खतरों से डरने का भाव ही जानवरों को जिंदा रखता है। जानकार कहते हैं कि इंसान ही ऐसा जीव है जिसे अपनी मौत का बखूबी एहसास है। खुदकुशी, अपनी मौत का वक्त करीब लाना, उसे तय करना है। फिलहाल जानवरों में ये एहसास नहीं पाया जाता।