इतिहास गवाह है कि सदियों पहले से मानव दिमाग और शरीर से जुड़े कई भागों का इलाज खुद से करता था। इसके लिए वो जंगलों से दवाइयां बनाने से लेकर सर्जरी भी करता है।
भारत में ऐसा करने के लिए सुश्रुत को जाना जाता है। लेकिन, ऐसे कई राज हैं जो अभी भी अनसुलझे हैं। वो कैसे प्रयोग करते रहें होंगे और इलाज की क्या प्रक्रिया रही होगी, कई बार हमारे लिए ये एक रहस्य बनता है।
डेली मेल में छपी खबर के वैज्ञानिकों को हाल ही में साइबेरिया के अटलाई पहाड़ों में कई इंसानी खोपड़ियां मिलीं। पता लगाया गया कि वो पैजीरिक नोमैड जनजाति के लोगों की हैं।
ऐसा कैसे हुआ?
लेकिन, वो सभी फूटी हुई हैं। यानी के बड़े गोले, जिसने वैज्ञानिक सकते में थे कि ऐसे क्यों है। इन सभी खोपड़ियों को स्टडी किया गया। पता चला कि इन सभी खोपड़ियों की सर्जरी की गई थीं और ये लोग ठीक भी हुए थे।
इस अतिपुराने मेडिकल प्रोसीजर का नाम ट्रिपनेशन है। इस तरह की सर्जरी में उस जमाने के ब्रेन सर्जन खोपड़ी को ड्रिल करते थे। ऐसा वो दिमाग की सूजन घटाने, दिमाग में खून जमने और रीढ़ की हड्डी से जुड़ी समस्याओं के समाधान को ठीक करने के लिए करते थे।
इस रिपोर्ट को साइबेरियन टाइम्स ने छापा है। वैज्ञानिकों ने बताया कि ट्रिपनेशन एक ऐसा प्रोसेस होता है जिसमें इंफेक्शन का हाई रिस्क होता था। ये तभी की जाती थी जब पेशेंट को बचाने का और कोई जरिया नहीं बचता था।
बहुत चाहिए ज्ञान
डॉक्टरों ने खोपड़ियों को देखकर जाना कि उनका ऑपरेशन करने वाले सर्जनों को वाकई बहुत ज्ञान रहा होगा। इन खोपड़ियों को देखकर पता चलता है कि वो बीमारी मुक्त हो गए थे।
प्रमाण बताते हैं कि पैजिरिक जनजाति के लोगों को न्यूरोसर्जरी, ग्रीक मेडिकल टेक्स्ट का अच्छा ज्ञान था। वैज्ञानिकों ने भी ये कोशिश की है कि की वो मरे हुए लोगों की खोपड़ियों पर ट्रिपनेशन करने की कोशिश की।
उन्होंने ये भी कहा कि ऐसा भी हो सकता है कि इस जनजाति के लोग कोई धार्मिक अनुष्ठान का हिस्सा होते हों जिसमें दिमाग को कई तरह के बेहोशी के लेवल में भेजा जाता रहा हो।
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