जयपुर की रहने वाली आयुषी ने हाल ही में अपने साथ हुई एक बाइक राइड का अनुभव अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर शेयर किया, जो देखने में तो बहुत नॉर्मल था, लेकिन उसमें इंसानियत और समझदारी का गहरा सबक छिपा था। उनकी इस पोस्ट ने सोशल मीडिया पर खूब ध्यान खींचा, क्योंकि इसमें एक छोटी-सी घटना में बड़ी सीख थी। आइए जानते हैं कि उन्होंने क्या पोस्ट किया है।
सोशल मीडिया पर साझा किया पोस्ट
आयुषी ने बताया कि एक दिन ऑफिस से घर लौटते वक्त उन्होंने ओला बाइक बुक की। शुरुआत में सब ठीक चल रहा था, लेकिन कुछ ही देर बाद ड्राइवर ने अचानक बाइक रोक दी। उन्होंने सोचा कि शायद कोई टेक्निकल दिक्कत होगी, लेकिन ड्राइवर ने कहा, “मैडम, पेट्रोल खत्म हो गया है।” इस वक्त आयुषी के सामने दो रास्ते थे। या तो राइड कैंसल करके दूसरी बुक करें या फिर ड्राइवर की मदद करें। उन्होंने बिना झिझके दूसरा रास्ता चुना और ड्राइवर के साथ पैदल पेट्रोल पंप तक जाने लगीं।
https://www.linkedin.com/posts/ayushi-gupta-663257245_yesterday-i-took-an-ola-bike-home-from-office-activity-7390624740056543232-llCf?utm_source=share&utm_medium=member_desktop&rcm=ACoAAFCMAoABR_zu67e1SdLERVRFDm_uOqcYotw
आयुषी ने की ड्राइवर की मदद
करीब एक किलोमीटर दोनों पैदल चले। चलते वक्त आयुषी ने देखा कि उनके मोबाइल पर दिखने वाला ETA यानी पहुंचने का अनुमानित समय 6:33 से बढ़कर 7 बजे हो गया था, लेकिन उन्हें कोई गुस्सा नहीं आया। उन्होंने मन ही मन सोचा, ‘चलो, थोड़ी शाम की वॉक हो गई।’ पेट्रोल भरवाने के बाद दोनों फिर बाइक पर बैठे और सफर पूरा हुआ। घर पहुंचने पर ऐप में किराया 101 रुपये दिखा। उन्होंने बिना देर किए पेमेंट किया और उतरने लगीं। तभी ड्राइवर ने पीछे से कहा, “मैडम 108 रुपये हुआ है।” आयुषी थोड़ी हैरान हुईं बोलीं, “लेकिन ऐप तो 101 रुपये दिखा रहा था।” ड्राइवर ने कहा, “शायद बढ़ गया होगा।” उन्होंने कुछ नहीं कहा, बस मुस्कुराई और 7 रुपये और दे दिए।
इंसानियत दिखाने का नहीं मिला फल
घर पहुंचकर जब उन्होंने यह बात मां को सुनाई तो मां की आंखों में आंसू आ गए। वो रोने लगीं, लेकिन वजह सिर्फ सात रुपये नहीं थी। उन्हें दुख इस बात का था कि उनकी बेटी ने पूरे समय ड्राइवर की मदद की। धूप में पैदल चली, देर हुई लेकिन शिकायत नहीं की फिर भी उसी ड्राइवर ने अंत में उससे वो पैसे ले लिए जो उसकी ही गलती से बढ़े थे। जब आयुषी ने यह बात अपने भाई को बताई तो वह हंसते हुए बोला, “अरे सात रुपये के लिए रो रही हो?” लेकिन वह नहीं समझ पाया कि बात पैसों की नहीं, बल्कि भरोसे और इंसानियत की थी। तभी उनकी मां ने बहुत सुंदर बात कही, “बेटा, कभी-कभी लोग अपनी परेशानियों में इतने उलझ जाते हैं कि उन्हें सामने वाले की अच्छाई नजर ही नहीं आती। इसका मतलब ये नहीं कि तुम्हारी दया बेकार गई। तुमने अच्छा किया, वही तुम्हारे भीतर की रोशनी है।”