कभी-कभी एक पिता अपनी बेटी की सुरक्षा के लिए ऐसा फैसला लेता है, जिसकी कल्पना भी मुश्किल होती है। अफगानिस्तान की महिला अधिकार कार्यकर्ता नीलोफर अयूबी की जिंदगी ऐसी ही एक सच्ची कहानी बयां करती है। यह सिर्फ एक परिवार का संघर्ष नहीं, बल्कि उन हालातों की तस्वीर भी है, जहां बेटी होना ही सबसे बड़ा खतरा बन जाता है। तो आइए जानते हैं कि क्या है पूरी कहानी।
बेटी को पड़े थप्पड़ पर पिता ने लिया यह फैसला
एक रिपोर्ट की मानें तो नीलोफर अयूबी का जन्म 1996 में अफगानिस्तान के कुंदुज शहर में हुआ था। जब वह सिर्फ चार साल की थीं तब तालिबान का प्रभाव पूरे इलाके में था। एक दिन वह बिना हिजाब के सड़क पर निकलीं तो एक व्यक्ति ने उन्हें जोरदार थप्पड़ मार दिया। इतना ही नहीं उसने यह जानने की भी कोशिश की कि वह लड़का हैं या लड़की। उस समय नीलोफर के पिता ने सूझबूझ से स्थिति संभाल ली, लेकिन इस घटना ने उन्हें भीतर तक डरा दिया।
बेटी को बेटे की तरह रखा
अपनी बेटी को ऐसे माहौल से बचाने के लिए पिता ने एक बड़ा फैसला लिया। उन्होंने नीलोफर के बाल छोटे कटवा दिए, उन्हें भाइयों जैसे कपड़े पहनाए और समाज के सामने उन्हें बेटे के रूप में पेश करना शुरू कर दिया। अगले 10 वर्षों तक नीलोफर की पहचान एक लड़के की रही। अफगानिस्तान में इस प्रथा को 'बाचा पोश' कहा जाता है। इसके तहत कुछ परिवार अपनी बेटियों को कुछ साल के लिए लड़कों की तरह पालते हैं ताकि वे समाज की पाबंदियों से बच सकें, स्कूल जा सकें, बाहर निकल सकें और परिवार के कामों में हाथ बंटा सकें।
परिवार और समाज ने माना लड़का
चार से 14 साल की उम्र तक नीलोफर ने लड़के की तरह जीवन बिताया। इस दौरान वह अपने पिता के साथ बाजार जाती थीं, बस में सफर करती थीं और खुलकर खेलती थीं। नीलोफर के मुताबिक उस समय अफगान समाज में दो साल के एक लड़के को भी महिलाओं की तुलना में ज्यादा अधिकार हासिल थे। हालांकि, इस झूठी पहचान की एक बड़ी कीमत भी थी। परिवार और समाज उन्हें लड़का मानते रहे इसलिए किशोरावस्था में होने वाले शारीरिक बदलावों के बारे में किसी ने उन्हें नहीं बताया। जब 13 साल की उम्र में उन्हें पहली बार पीरियड्स हुए तो वह बुरी तरह घबरा गईं क्योंकि उन्हें समझ ही नहीं आया कि उनके साथ क्या हो रहा है। इसके बाद परिवार के लिए उनकी असल पहचान छिपाना संभव नहीं रहा। उनकी मां यह सोचकर रो पड़ीं कि अब उनकी बेटी की वह आजादी खत्म हो जाएगी, जो उसे लड़के की पहचान के कारण मिली थी।
दोबारा से लड़की का जीवन जीना नहीं था आसान
दोबारा लड़की के रूप में जीवन शुरू करना नीलोफर के लिए आसान नहीं था। घर की सीमाओं में सिमट जाना उन्हें भीतर तक तोड़ देता था। वह अक्सर यही सोचकर रोती थीं कि काश वह सचमुच लड़का होतीं। हालांकि, इसी संघर्ष ने उन्हें मजबूत बनाया। पिता के सहयोग से वह आगे की पढ़ाई के लिए भारत आईं। बाद में उनके परिवार ने काबुल में फर्नीचर का कारोबार शुरू किया, जहां सैकड़ों महिलाओं को रोजगार मिला।
अफगानिस्तान को छोड़ना पड़ा
साल 2021 में तालिबान के दोबारा सत्ता में आने के बाद नीलोफर और उनके परिवार को अपनी जान बचाने के लिए अफगानिस्तान छोड़ना पड़ा। फिलहाल वह पोलैंड में रह रही हैं और दुनिया भर में अफगान महिलाओं के अधिकारों और उनकी आजादी की आवाज बुलंद कर रही हैं। उनकी कहानी आज भी यह याद दिलाती है कि कई बार एक पिता अपनी बेटी को बचाने के लिए उसे उसकी असली पहचान से भी दूर कर देता है।