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जर्मनी का वो वीरान गांव, जहां बनी थी दुनिया की पहली मिसाइल फैक्ट्री

Tue, 24 Dec 2019 02:03 PM IST
सोनू शर्मा फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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पेनमुंडे गांव - फोटो : Social media
आज दुनिया मिसाइलों और रॉकेटों के जरिए जंग लड़ती है। हर देश तरह-तरह की मिसाइलें अपने हथियारों के जखीरे में रखता है ताकि दुश्मन को दूर से ही नेस्तनाबूद किया जा सके। भारत के पास भी, पास और दूर तक मार करने वाली कई तरह की मिसाइलें हैं। इनमें से कुछ मिसाइलों को अंतरिक्ष में सैटेलाइट लॉन्च करने वाले रॉकेट में तब्दील कर लिया गया है। पर, क्या आपको पता है कि मिसाइल बनाने का काम किस देश ने सबसे पहले शुरू किया था? आप इस सवाल का जवाब सुनेंगे तो हैरान रह जाएंगे। जर्मनी वो पहला देश था जिसने युद्ध में मिसाइलों का इस्तेमाल करने की सोची थी।
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पेनमुंडे गांव - फोटो : Social media
ये बात और है कि आज रूस और अमेरिका इस रेस में बहुत आगे निकल गए हैं। मगर मिसाइलों की इस होड़ की शुरुआत जर्मनी ने ही की थी। बाद में वहीं के वैज्ञानिकों ने रूस और अमेरिका में मिसाइलों के निर्माण में अहम रोल निभाया। ये बात और है कि जर्मनी खुद कभी मिसाइलों का इस्तेमाल नहीं कर सका। 
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पेनमुंडे गांव - फोटो : Social media
ये बात दूसरे विश्व युद्ध के दौरान की है। जर्मनी का एक गांव मिसाइल फैक्ट्री के तौर पर विकसित किया गया था। इस गांव का नाम है, पेनमुंडे। ये गांव जर्मनी के यूसडम द्वीप में पेन नदी के मुहाने पर स्थित है। पेन नदी, यहां पर आकर बाल्टिक सागर में गिरती है। यूसडम द्वीप यूं तो अपने शानदार बीच और मछली से बने सैंडविच के लिए मशहूर है। एतिहासिक काल में भी यहां के द्वीप प्रशिया की राजशाही के बीच बेहद लोकप्रिय थे। बाद में पूर्वी जर्मनी के लोग भी यहां छुट्टियां बिताने आया करते थे। 

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पेनमुंडे गांव - फोटो : Social media
1936 से 1945 के बीच इस द्वीप के पेनमुंडे गांव को नाजी सरकार ने अपने बेहद खुफिया मिशन का अड्डा बनाया था। 1935 में जर्मन इंजीनियर वर्नहर वॉन ब्रॉन ने पेनमुंडे गांव को अपने मिसाइल के कारखाने के लिए चुना था। इसके आसपास का चार सौ किलोमीटर का इलाका सुनसान था। ब्रॉन ने सोचा कि ये जगह उनके रॉकेट के परीक्षण के लिए बिल्कुल सही रहेगी। सरकार से इजाजत मिलने के बाद यहां मिसाइल का कारखाना और टेस्टिंग रेंज स्थापित करने का काम बड़ी तेजी से हुआ। करीब 12 हजार लोगों ने यहां दिन-रात काम करके दुनिया की पहली क्रूज मिसाइल बनाने की फैक्ट्री और टेस्टिंग रेंज को तैयार किया। 
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पेनमुंडे गांव - फोटो : Social media
ये फैक्ट्री करीब 25 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैली थी। पेनमुंडे में होने वाला रिसर्च और मिसाइल टेस्ट, दुनिया के सबसे बड़े युद्ध के लिए ही अहम नहीं थे, बल्कि आने वाले वक्त के लिए भी बेहद अहम साबित हुए। इस गांव में ही रॉकेट तकनीक की बुनियाद रखी गई जिसकी मदद से आगे चलकर इंसान ने अंतरिक्ष का सफर शुरू किया। आज पेनमुंडे गांव एक उजाड़ जगह है। इमारत के नाम पर लाल रंग का एक पॉवर स्टेशन बचा है जिसमें पेनमुंडे हिस्टोरिकल टेक्निकल म्यूजियम स्थापित किया गया है। पूरे इलाके में रॉकेट के टुकड़े, पतवार, इंजन और दूसरे यंत्र बिखरे हुए हैं। इन्हें देखकर खौफ का अहसास होता है। 
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पेनमुंडे गांव में बनी मिसाइल - फोटो : Social media
इस जगह की अहमियत एक भाषण के दस्तावेज से साबित होती है। ये भाषण वाल्टर डॉर्नबर्गर ने 1942 में लिखा था, जिसमें वॉल्टर ने जर्मनी के रॉकेटर एग्रीगेट 4 (A-4) के कामयाब परीक्षण का जिक्र किया था। ये दुनिया का पहला लंबी दूरी तक मार करने वाला रॉकेट था। इसका दूसरा नाम 'वेंजियंस वेपन' या बदला लेने वाला हथियार था। इस रॉकेट के परीक्षण के बाद वॉल्टर डॉर्नबर्गर और वर्नहर वॉन ब्रॉन जैसे वैज्ञानिक ये मानते थे कि इसकी मदद से वो दूसरा विश्व युद्ध आसानी से जीत जाते। जर्मनी में नए हथियारों के विकास के लिए जिम्मेदार अल्बर्ट स्पीर भी इससे सहमत थे। मगर जर्मनी के तानाशाह हिटलर को इस पर यकीन नहीं था। इसलिए, जर्मनी की सरकार ने रॉकेट के सफल परीक्षण को ज्यादा भाव नहीं दिया।
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पेनमुंडे गांव - फोटो : Social media
जब हिटलर ने 1939 में युद्ध का एलान किया तो, पेनमुंडे का कारखाना उस वक्त पूरी तरह से तैयार नहीं था। इसके बाद जर्मन सरकार युद्ध में फंस गई और उसने पेनमुंडे में मिसाइलों के विकास पर न तो पैसा खर्च किया और न ही उसे अहमियत दी। 1943 में तमाम कोशिशों के बाद डॉर्नबर्गर और वॉन ब्रॉन ने A-4 रॉकेट के कामयाब परीक्षण की एक फिल्म हिटलर को दिखाई। तब जाकर हिटलर ने इस मिसाइल के निर्माण को हरी झंडी दी। लेकिन, तब तक युद्ध के मोर्चे पर बहुत देर हो चुकी थी। जर्मन फौजें कई मोर्चों पर हार रही थीं।

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पेनमुंडे गांव - फोटो : Social media
जून, 1943 में यहूदी युद्धबंदियों को इस कारखाने में काम पर लगाया गया। ये युद्धबंदी यूरोप के अलग-अलग देशों से लाए गए थे। इसी दौरान ब्रिटिश खुफिया एजेंसियों को भी पेनमुंडे के इस खुफिया रॉकेट कारखाने की भनक लग गई। फिर 17 अगस्त, 1943 को ब्रिटिश रॉयल एयरफोर्स ने उस वक्त का सबसे बड़ा हवाई हमला पेनमुंडे पर किया। इसे ब्रिटेन ने ऑपरेशन हाइड्रा नाम दिया था, हालांकि ये हमला नाकाम रहा। लेकिन इससे हिटलर की सेना का मिसाइल निर्माण का अभियान धीमा पड़ गया। फिर कारखाने को पेनमुंडे से हटाकर मध्य जर्मनी के मिटेलवर्क ले जाया गया।

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पेनमुंडे गांव - फोटो : Social media
1944 में हिटलर को वॉन ब्रॉन और वॉल्टर के काम को कम करके आंकने की गलती का अहसास हुआ। हिटलर ने फील्ड मार्शल वॉन ब्रॉकित्स से माफी मांगी। उसने वाल्टर डोर्नबर्गर से भी माफी मांगी और कहा कि वो उनकी रिसर्च की अहमियत नहीं समझ सका था। दूसरे विश्व युद्ध में जर्मनी हार गया, लेकिन इसके बाद भी रॉकेट और मिसाइल तकनीक के विस्तार का काम रुका नहीं। 

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पेनमुंडे गांव - फोटो : Social media
युद्ध के बाद अमेरिका, रूस और ब्रिटेन की अगुवाई वाले मित्र देशों ने A-4/V-2 मिसाइल की तकनीक हासिल करने की कोशिश की। इस काम में जर्मन वैज्ञानिकों की मदद ली गई। नाजी जर्मनी में जो लोग इस तकनीक को विकसित करने पर काम कर रहे थे, उन्हें सोवियत संघ, ब्रिटेन, फ्रांस और अमेरिका में शरण दी गई। इनमें से वॉन ब्रॉन को अमेरिका ने नागरिकता दी। ब्रॉन बाद में नासा के लिए काम करने लगे थे। उन्होंने अमेरिका के मशहूर अपोलो मिशन के लिए काम किया। अपोलो मिशन से ही अमेरिकी अंतरिक्ष यात्रियों ने चांद तक का सफर तय किया। 

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पेनमुंडे गांव में बनी मिसाइल - फोटो : Social media
पेनमुंडे में हुए रिसर्च की बुनियाद पर आगे चलकर इंटरकॉन्टिनेंटल मिसाइलें विकसित की गईं। इन्हीं की मदद से अंतरिक्ष में सैटेलाइट लॉन्च करने के लिए रॉकेट बनाए गए। शीत युद्ध के दौरान इस तकनीक को बेहतर बनाने पर काफी काम हुआ। पेनमुंडे की सबसे बड़ी विरासत हमें ये समझाती है कि तकनीक, इंसान की जिंदगी पर कितना गहरा असर डालती है। समाज में इंजीनियरों और वैज्ञानिकों के रोल की अहमियत भी जर्मनी का ये गांव हमें समझाता है। पेनमुंडे में स्थित म्यूजियम की देखभाल करने वाले डॉक्टर फिलिप औमान कहते हैं कि नई तकनीक का विकास हमारे वैज्ञानिकों की विरासत और कामयाबी की कहानियां कहता है। 
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पेनमुंडे गांव - फोटो : Social media
पेनमुंडे आज हमें इस बात का अहसास कराता है कि सही इस्तेमाल से तकनीक हमें चांद तक पहुंचा सकती है। तो गलत इस्तेमाल से इंसानियत तबाह भी हो सकती है। पेनमुंडे को कलाकारों ने भी काफी अहमियत दी है। कैटालोनिया के पेंटर ग्रेगोरियो इग्लेसियास मेयो और मेक्सिकन कलाकार मिगुएल अरागोन ने इस म्यूजियम पर आधारित कई कलाकृतियां बनाई हैं। पेनमुंडे को इन कलाकारों ने इंसानियत के तमाम अहसासों का प्रतीक बताया है। ये ज़ुल्म का भी प्रतीक है जहां यहूदी युद्धबंदियों का शोषण किया गया। वहीं इंसान की अक्लमंदी की भी ये मिसाल है जिसने इतनी शानदार तकनीक विकसित की। पेनमुंडे जो कभी यूरोप की तबाही का केंद्र बनने की तरफ बढ़ रहा था, आज दुनियाभर के संगीतकारों की मेजबानी करता है। 2002 में यहां पर एक बड़ा संगीत समारोह हुआ था। 2002 में इस म्यूजियम को शांति की कोशिशों के लिए अवॉर्ड मिला था। 
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