हालांकि उस दौर में इन्हीं बच्चों में से वामपंथी नेता चुने जाते थे। ये चलन और कई रेल लाइनें अब बंद हो चुकी हैं। वहीं कुछ बंद होने के कगार पर हैं। लेकिन हंगरी की सरकार अपनी इस धरोहर को आज भी संजोए रखना चाहती है। इनके मुताबिक बच्चों से रेलवे में काम कराने से एक तो उन्हें काम करने का असल तजुर्बा होता है। वो सिर्फ किताबों के रट्टू तोता बनकर नहीं रहते। दूसरे कम उम्र में ही उन्हें काम करने का अच्छा खासा तजुर्बा हो जाता है।
जेरमेकवासुतास में आम-तौर पर कोई भी शख्स नाश्ते से पहले नहीं जा सकता, लेकिन अगर ऐसा करने का मौका मिले तो आप देखेंगे कि ये बच्चे कितने अनुशासन में रहते हैं। सुबह आठ बजे सभी बच्चे सबसे पहले अपने अपने क्लास रूम में जमा होते हैं। यहां से फ्रॉग मार्च करते हुए स्कूल के आंगन में पहुचंते हैं। जिन बच्चों की स्टेशन पर ड्यूटी होती है वो सभी नीले रंग की जैकेट और मिलिट्री कैप पहने होते हैं। कोई एक अध्यापक सभी बच्चों को दिनभर में किए जाने वाले कामों के बारे में बताता है। अपने उस्ताद की हिदायतों को ये बच्चे बड़े ही सम्मान से सिर झुका कर सुनते हैं। ड्रिल पूरी हो जाने के बाद सभी की यूनिफॉर्म जांची जाती है।
देखा जाता है कि शर्ट अच्छी तरह से पतलून के अंदर है या नहीं। जूते अच्छी तरह से पॉलिश किए गए हैं या नहीं। कोई भी बच्चा किसी भी बात का जवाब सिर झुका कर ही देता है। इसके बाद सभी बच्चे अपना झंडा फहराते हैं और कौमी तराना गाते हैं। दिलचस्प बात है कि हंगरी का झंडा भी भारत के झंडे की तरह तिरंगा है।
राष्ट्र गान हो जाने के बाद बच्चे अलग अलग ग्रुप में बंट जाते हैं। हरेक ग्रुप में 10 से 14 साल की उम्र के बच्चे होते हैं। ये बच्चे हंगरी के सभी स्कूलों से चुने जाते हैं। यहां इन सभी बच्चों को छह महीने की ट्रेनिंग करनी पड़ती है। उसके बाद काम के मुताबिक इन्हें ग्रेड दिए जाते हैं। छात्र मिहेल सेरजेगी तीन साल पहले अपनी ट्रेनिंग पूरी कर चुके हैं। वो कहते हैं कि उनके पिता ने भी इस ट्राम रेलवे में काम किया है और वो अपने पिता के नक्शे कदम पर ही चलना चाहते थे। उन्होंने ये ट्रेनिंग स्कूल से छुटकारा पाने के लिए नहीं ली थी बल्कि वो व्यवहारिक जानकारी रखना चाहते थे इसलिए यहां काम किया था।
इसी तरह जब आप 11 साल की जैस्मिन से मिलेंगे तो उसे काम करता देख हैरत में पड़ जाएंगे। वो यहां टिकट बेचती हैं। मुसाफिरों से अपने खास अंदाज में अंग्रेजी में बात करती हैं। वो आत्मविश्वास से लबरेज नजर आती हैं। उनका कहना है कि ट्रेनिंग शुरू करने से पहले उसे जोड़-घटाव करने में बहुत दिक्कत आती थी। उनकी गणित बहुत कमजोर थी, लेकिन यहां काम करने से उसके लिए गणित के सवाल-जवाब आसान हो गए हैं। हंगरी के लोगों को अपने इतिहास पर बहुत फख्र है। आज वहां के हालात काफी बदल गए हैं, लेकिन इन ट्राम स्टेशनों पर आज भी कम्युनिस्ट शासन के दौर का काम का तरीका नजर आता है। यहां के काम का ताना-बाना टीम वर्क है।
यहां ये बच्चे उसी तरह काम करते हैं जिस तरह सोवियत संघ के समय में मॉस्को के लोग करते थे, लेकिन कुछ लोग अब इस रिवाज को खत्म करना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि ये तरीका अब पुराना पड़ चुका है और सबसे बड़ी बात ये कि इस तरीके में कम्युनिज्म की बू आती है। वहीं कुछ लोग इसे जारी रखना चाहते हैं उनके मुताबिक इस तरीके से बच्चों को अपनी पढ़ाई में काफी मदद मिलती है। जब बच्चे टिकट बेचते हैं तो हिसाब-किताब करने की सलाहियत बेहतर होती है। जब स्विच के साथ काम करते हैं तो भौतिक विज्ञान के विषय में मदद मिलती है।
जब ये बच्चे विदेशियों से अंग्रेजी में बात करते हैं तो बिना किसी खास ट्रेनिंग के अंग्रेजी भाषा पर महारत हासिल हो जाती है। नई चीजें सीखने में ये ट्रेनिंग कितनी मददगार होती है, ये बात यहां ट्रेनिंग हासिल कर रहे बच्चों से बहतर और कौन जान सकता है। लोगों की राय चाह जो भी हो, एक बात बिल्कुल साफ है कि ये बच्चे अपने काम के तरीके से बड़े-बड़ों को हैरत में डालते हैं। इनके काम करने का तरीका वाकई काबिले तारीफ है।