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कोरोना वायरस से बचने के लिए यहां पत्तों को मास्क बनाकर पहन रहे हैं लोग

Thu, 26 Mar 2020 02:57 PM IST
सोनू शर्मा फीचर डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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पत्तों को मास्क बनाकर पहन रहे हैं लोग - फोटो : Jiwanand Haldar/Facebook
कोरोना वायरस से बचने के लिये आपको किसी ने तीन परतों वाला मास्क पहनने की सलाह दी होगी तो किसी ने N95 मास्क का भी जिक्र किया होगा, लेकिन कोरोना वायरस के खतरे के बारे में जानने के बाद बस्तर के कुछ इलाकों में आदिवासियों ने साल के पत्तों का ही मास्क बनाकर उसका उपयोग करना शुरू कर दिया है। 
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पत्तों को मास्क बनाकर पहन रहे हैं लोग - फोटो : Jiwanand Haldar/Facebook
असल में कांकेर जिले के अंतागढ़ के कुछ गांवों में जब एक बैठक बुलाई गई तो आदिवासी वहां पत्तों से बनाई गई मास्क पहनकर पहुंच गये। भर्रीटोला गांव के एक नौजवान ने बताया, 'कोरोना के बारे में गांव के लोगों ने सुना तो दहशत में आ गए। हमारे पास कोई और उपाय नहीं था। गांव वालों के पास तो मास्क है नहीं। इसलिए हमारे गांव के लोग अगर घरों से बाहर निकल रहे हैं तो वे सरई के पत्तों वाले मास्क का उपयोग कर रहे हैं।'
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कोरोना वायरस (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Pixabay
गांव के पटेल मेघनाथ हिडको का कहना था कि हमें कोरोना वायरस की जानकारी मिली तो लगा कि खुद ही उपाय करना पड़ेगा क्योंकि गांव से आसपास के सारे इलाके बहुत दूर हैं। इसके अलावा इस माओवाद प्रभावित इलाके में आना-जाना भी बहुत आसान नहीं है। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
एक चैनल के लिए काम करने वाले जीवानंद हल्दर ने इन इलाकों में रिपोर्टिंग के दौरान पाया कि पत्ते से बना मास्क एक गांव से दूसरे गांव तक पहुंच रहा है। उन्होंने कहा, 'आदिवासियों को इस तरह के मास्क पहने देखना मेरे लिए नया अनुभव था। एक गांव के लोग मास्क का उपयोग कर रहे हैं तो दूसरे गांव के लोग भी उसकी देखा-देखी पत्तों का मास्क लगाने लग गए हैं। आदिवासी एक दिन इसका उपयोग करते हैं और अगले दिन नया मास्क बना लेते हैं।' हालांकि चिकित्सकों का कहना है कि इस तरह के मास्क एक हद तक तो बचाव करते हैं लेकिन इसमें सांस लेने में तकलीफ भी हो सकती है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
रायपुर के डॉ. अभिजीत तिवारी ने कहा, 'आदिवासी समाज बरसों की अपनी परंपरा और ज्ञान से हम सबको समृद्ध करता रहा है। उनका पारंपरिक ज्ञान हमेशा चकित कर देता है, लेकिन कोरोना के मामले में बेहतर है कि वे भी देश के दूसरे नागरिकों की तरह अपने-अपने घरों में रहें। जरुरी हो तो सरकार को चाहिए कि वह आदिवासी इलाकों में कपड़ों से बने मास्क का मुफ्त वितरण करे, जिसे धो कर बार-बार उपयोग किया जा सके।'
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
राज्य के स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव ने कहा कि वो इस संबंध में जिले के कलेक्टर से बात करेंगे। उन्होंने कहा, 'लोगों ने स्वयं ऐसा किया होगा, मुझे ऐसा नहीं लगता। किसी एनजीओ या सामाजिक संगठन ने ऐसी पहल की होगी। वैसे मुझे लगता है कि किसी ने मास्क की कमी को दर्शाने के लिये पहल की होगी।' 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Social media
बस्तर के आदिवासियों के जीवन में पत्तों का बहुत महत्व है। खाना खाने के लिए वे साल, सियाड़ी और पलाश के पत्ते की थाली, दोना का उपयोग करते हैं और शराब पीने के लिए महुआ के पत्तों का। देवी-देवताओं के प्रसाद के लिए भी वे पत्तों का ही उपयोग करते हैं। इन आदिवासियों में बालों के जूड़े में पत्ता खोंसना और गले में पत्तों की माला पहनने का भी चलन है। यहां तक कि आदिवासियों की आजीविका में भी इन पत्तों की सबसे बड़ी भूमिका है। अकेले छत्तीसगढ़ में लगभग 14 लाख आदिवासी परिवार तेंदूपत्ता या बिड़ी पत्ता का संग्रहण करते हैं, जो इन आदिवासी परिवारों के लिए आय का बड़ा स्रोत है। 
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