ये लोग इंडोनेशिया और मलेशिया के बीच फैले समुद्री क्षेत्रों में रहने वाले बजाऊ समुदाय के सदस्य हैं। इनके घर जमीन पर नहीं, बल्कि पानी के ऊपर खंभों पर टिके लकड़ी के ढांचों में बने होते हैं, या फिर कई परिवार नावों को ही अपना स्थायी घर बना लेते हैं। लहरों के साथ बहती यही दुनिया इनके लिए पूरी जिंदगी है।
इस समुदाय की सबसे अलग बात यह है कि इनका किसी एक देश से स्थायी रिश्ता नहीं होता। पीढ़ियों से ये लोग समुद्र में ही रहते आ रहे हैं। यहां तक कि कई बच्चों का जन्म भी नावों पर ही होता है, और बचपन से ही उन्हें तैरना, मछली पकड़ना और समुद्र के साथ तालमेल बिठाना सिखा दिया जाता है। उनके लिए गोताखोरी सिर्फ एक कौशल नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जरूरत है।
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बजाऊ लोगों की शारीरिक क्षमता भी बेहद खास मानी जाती है। ये बिना किसी ऑक्सीजन सपोर्ट के करीब 30 मीटर या उससे ज्यादा गहराई तक आसानी से गोता लगा सकते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि पीढ़ियों से समुद्र में रहने के कारण उनके शरीर ने खुद को इस वातावरण के अनुसार ढाल लिया है। उनकी आंखें पानी के भीतर भी बेहतर तरीके से देख पाती हैं, जो आम इंसानों के लिए मुश्किल होता है।