जवानों के जोशीले आवाज और उनकी परफॉर्मेंस का यह वीडियो अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। अब लोगों के मन में सवाल है कि आखिर यह गाना क्यों इतना खास है? इस गाने के पीछे की कहानी क्या है? इन सवालों का जवाब इतिहास के पन्नों में छिपा है और असम रेजीमेंट की बहादुरी के साथ वर्ल्ड वॉर-2 की घटनाओं से जुड़ा है। यह गीत एक सच्चे सैनिक राइफलमैन बदलूराम की स्मृति में बनाया गया था।
बदलूराम ब्रिटिश इंडियन आर्मी की फर्स्ट बटालियन, असम रेजीमेंट के सैनिक थे। जब द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान भारतीय और ब्रिटिश सैनिक जापान की सेना से लड़ रहे थे, तब बदलूराम भी इसी मोर्चे पर तैनात थे। लड़ाई के दौरान वे शहीद हो गए और उनकी शहादत के कुछ समय बाद ही हालात और बिगड़ते चले गए।
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जापान की सेना ने कोहिमा क्षेत्र को घेर लिया। नतीजा यह हुआ कि ब्रिटिश इंडियन आर्मी की सप्लाई लाइन कट गई और सैनिकों के सामने भोजन की गंभीर समस्या उतपन्न हो गई। दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों और जापान की एंटी-एयरक्राफ्ट गन के कारण एयरड्रॉप सप्लाई भी असंभव हो गई थी। इन कठिन परिस्थितियों में एक ऐसी घटना घटी, जो किसी चमत्कार से कम नहीं थी। दरअसल, बदलूराम की कंपनी के वाटर मास्टर ने राशन सूची से उनका नहीं हटाया था। इसकी वजह से रोजाना बदलूराम के नाम का अतिरिक्त हिस्सा दर्ज होता रहा।
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महीनों तक जमा किया गया यह एक्स्ट्रा राशन बाद में घिरे सैनिकों के लिए जीवनदान बना। हालात बेहद गंभीर होने के बाद इसी अतिरिक्त राशन ने सैनिकों को भूख से बचाकर रखा और उन्हें लड़ाई जारी रखने की हिम्मत दी। बदलूराम की इस अदृश्य, लेकिन महत्वपूर्ण भूमिका की याद में 1946 में मेजर पी.टी. पॉटर ने इस गीत को लिखा-बदलूराम का बदन जमीन के नीचे है। समय के साथ ही यह गीत असम रेजीमेंट की पहचान बन गया। शिलांग में आज भी रंगूट पासिंग आउट परेड के दौरान यह गीत हाते हैं।
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सैनिकों के लिए यह धुन साहस, बलिदान और भाईचारे की भावना को सलाम करने का तरीका है। इसी गाने पर असम रेजीमेंट के जवानों का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। देशभर के लोग उस वीर कहानी को फिर से याद कर रहे हैं, जिससे इस गीत का जन्म हुआ।