मुजफ्फरपुर कांड में जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ती जा रही है, एक से बढ़कर एक रसूखदारों के नाम सामने आ रहे हैं। अब इनमें और भी कई बड़े नाम शामिल हो सकते हैं, क्योंकि बिहार सरकार ने इस पूरे कांड की सीबीआई जांच की सिफारिश कर दी है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार पुलिस के मुखिया के एस द्विवेदी, मुख्य सचिव और प्रमुख सचिव गृह को तत्काल ही इस केस को सीबीआई को सौंपने का आदेश दे दिया है।
लेकिन टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज की रिपोर्ट के बाद जो पहली गिरफ्तारी हुई वो थी ब्रजेश ठाकुर की। वही ब्रजेश ठाकुर, जिसके एनजीओ सेवा संकल्प एवं विकास समिति की ओर से बालिका गृह चलाया जा रहा था। 29 बच्चियों के साथ हुए रेप के मामले की सीबीआई जांच करवाने के लिए विपक्ष ने बिहार विधानसभा के बाहर धरना-प्रदर्शन किया। इसके बाद सरकार ने सीबीआई से जांच करवाने की संस्तुति कर दी।
ब्रजेश ठाकुर रहने वाला मुजफ्फरपुर का ही है
इसके पिता राधामोहन ठाकुर ने 1982 में मुजफ्फरपुर से एक हिंदी अखबार शुरू किया था। इस अखबार का नाम था प्रात: कमल। राधामोहन ठाकुर की पत्रकारों के बीच अच्छी पहुंच थी। बिहार में छोटे अखबारों को शुरू करने वाले शुरुआती नामों में से एक नाम राधामोहन ठाकुर का भी था। धीरे-धीरे राधामोहन ठाकुर ने अपने रसूख का इस्तेमाल कर अपने अखबार के लिए सरकारी विज्ञापन लेने शुरू कर दिए।
इन विज्ञापनों से राधामोहन ठाकुर ने खूब पैसे बनाए और फिर उसे रियल स्टेट में लगा दिया। वो रियल स्टेट का शुरुआती दौर था, तो राधामोहन ठाकुर ने इससे भी खूब पैसे बनाए। जब पिता की मौत हो गई, तो विरासत संभालने का जिम्मा आया ब्रजेश ठाकुर पर। पैसे पहले से ही थे और पिता का रसूख भी था। इसलिए ब्रजेश के हाथ में कमान आते ही उसने रियल स्टेट के कारोबार से एक कदम आगे बढ़कर राजनीति में हाथ आजमाना शुरू कर दिया।
ब्रजेश ठाकुर के पिता राधामोहन ठाकुर ने प्रात: कमल अखबार की स्थापना की थी
1993 में जब बिहार के एक चर्चित नेता आनंद मोहन ने जनता दल से अलग होकर अपनी पार्टी बिहार पीपल्स पार्टी बनाई तो ब्रजेश ठाकुर उसमें शामिल हो गया। 1995 में बिहार में विधानसभा के चुनाव हुए, तो ब्रजेश ठाकुर मुजफ्फरपुर के कुढ़नी विधानसभा सीट से बिहार पीपल्स पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ गया।
उसके सामने थे लालू यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल के दिग्गज नेता बसावन भगत। लेकिन इस चुनाव में बिहार का एक और बाहुबली मैदान में था। उस बाहुबली का नाम था अशोक सम्राट। अशोक सम्राट के बारे में कहा जाता है कि बिहार के अपराध जगत में 90 के दशक में एके 47 की जो पहली खेप पहुंची थी, वो अशोक सम्राट के पास ही पहुंची थी, जिससे बरौनी में जीरोमाइल के पास एक ठेकेदार की हत्या की गई थी। इस हत्या के बाद से ही अशोक सम्राट का उत्तरी बिहार में सिक्का चलने लगा था।
इसी अशोक ने सीधे-सीधे ब्रजेश ठाकुर को चुनाव न लड़ने की धमकी दी। जब तक सम्राट अशोक की धमकी पर ब्रजेश ठाकुर नाम वापस लेता, नाम वापसी का दिन बीत गया था। इसके बाद ब्रजेश ठाकुर ने खुद को चुनाव से अलग कर लिया। जब नतीजा आया तो बसावन भगत चुनाव जीत गए थे और ब्रजेश ठाकुर को 202 वोट मिले थे।
2000 के विधानसभा चुनाव में भी ब्रजेश ठाकुर एक बार फिर से कुढ़नी से ही चुनाव लड़ने उतरा। इस बार उसे अशोक सम्राट की धमकी का डर नहीं था, क्योंकि हाजीपुर पुलिस ने अशोक सम्राट को एक मुठभेड़ में मार गिराया था। ब्रजेश ने जमकर चुनाव प्रचार किया और खूब पैसे खर्च किए, लेकिन वो जीत नहीं सका। इस बार भी बसावन भगत ने ब्रजेश को मात दी, लेकिन इस चुनाव में ब्रजेश दूसरे नंबर पर आ गया था। उसे 32,795 वोट मिले थे, जबकि बसावन भगत को 48,343 वोट मिले थे। 2005 में ब्रजेश ठाकुर फिर से चुनाव लड़ता, उससे पहले ही 2004 में बिहार पीपल्स पार्टी के मुखिया आनंद मोहन ने अपनी पार्टी का कांग्रेस के साथ विलय कर दिया।