बिहार में जाति आधारित जन-गणना की चर्चा के साथ ही इसपर पक्ष और विपक्ष का बंटवारा हो गया था। राजनीतिक दलों से ज्यादा आमजन का। इसलिए, ‘अमर उजाला’ ने जातीय जन-गणना को लेकर डेढ़ दर्जन से ज्यादा एंगल पर खबर लाई, लेकिन सत्ता-विपक्ष के राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया नहीं लेकर आमजन से बात की। अब जब हाईकोर्ट ने इसपर दो महीने के लिए रोक लगाई है तो भी इसपर आमजन की ही प्रतिक्रिया ली। ज्यादातर लोग खुश दिखे, लेकिन कुछ ने आगे इसके जारी रहने की उम्मीद भी जताई। प्रतिक्रिया लेने के क्रम में कुछ लोगों ने चुप्पी भी साथ ली, क्योंकि इन्हें नाराजगी का डर था।
जात-पात पर क्या बोले सामाजिक कार्यकर्ता
पटना के सामाजिक कार्यकर्ता हैं कमल नोपानी। इनकी पत्नी पटना के मेयर चुनाव में उतरी थीं। राजनीतिक जुड़ाव भी है, लेकिन सीधे राजनीतिज्ञ नहीं है। इनकी प्रतिक्रिया की पहली लाइन ही थी कि "कोर्ट का आदेश है तो कुछ बोलना नहीं चाहिए, लेकिन आश्चर्य लग रहा है। काम आगे बढ़ने के बाद स्टे लगा है।" हालांकि, उन्होंने उम्मीद जताई कि कुछ सुधार या बदलाव के साथ कोर्ट इसे आगे कराने का फैसला दे सकता है, क्योंकि कहीं न कहीं इसमें जनता के हित की बात है। सामाजिक कार्यकर्ता बिनोद हिसारिया की राय इससे बिल्कुल उलट है। वह कहते हैं- “यह आदेश पूरी तरह सही है। आप एक-एक जन की गणना करा रहे थे, जो केंद्र का काम है। इसके साथ जाति की खाई को पाटने की जगह बढ़ाने की जिद पर थे। इसलिए यह तो होना ही था।" सामाजिक कार्यकर्ता मयूर मयंक इसी बात को आगे बढ़ाते हुए अपनी तरह से बात करते हैं। कहते हैं- “जात-पात को आम लोग नहीं, बल्कि सरकार या नेता ही बढ़ाते हैं। जब हम स्कूल में थे तो हमलोग किसी की जात नहीं जाने। अब सरकार जबरदस्ती जाति भरवा रही। सरकार ही गलत बीज बो रही है थी, इसलिए इसपर रोक लगाकर कोर्ट ने तो अच्छा काम किया है।"
आशुतोष बोले- सरकार की मंशा साफ हो गई
भूमिहार ब्राह्मण एकता मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष आशुतोष कुमार ने कहा कि सरकार इसे जाति आधारित गणना बता रही थी, लेकिन वह कोर्ट में नहीं समझा सकी कि यह जन-गणना नहीं तो और क्या है। उन्होंने कहा- "कोर्ट के फैसले से आमजन में यह विश्वास प्रगाढ़ होगा कि सरकार राजनीतिक हित को साधने के लिए गलत कर रही थी, इसलिए यह रोक लगी। बैकवर्ड-फॉरवर्ड करने वाले लोगों की मंशा इसी बहाने जातियों के आधार पर राजनीतिक रोटियां सेंकने की थी, जिसे कोर्ट ने रोक दिया है। यह रोक भी एक-दो दिन नहीं, बल्कि पूरे दो महीने की है। सरकार की नीतियां सही होती तो इसपर कानून पास कराया जाता, लेकिन ऐसा तो हुआ नहीं।"
अलग शहरों के लोगों की राय भी अलग-अलग
निजी कंपनी में कार्यरत भागलपुर निवासी परितोष सिन्हा ने जहां कोर्ट के निर्णय को सही करार दिया। वहीं, इसी शहर के उदय घोष ने कहा कि "सरकार सिर्फ राजनीति के लिए यह करवा रही थी कि किस पार्टी के स्वाभाविक वोटर कितने हैं। इसलिए कोर्ट का निर्णय बहुत अच्छा है।" पटना में आमजन के सहयोग के लिए चर्चित युवा सामाजिक कार्यकर्ता शुभम सिंह ने कहा कि "सर्वेक्षण नाम देकर सरकार जातिगत जनगणना कर रही थी, जो उसके अधिकार क्षेत्र में था ही नहीं।" मोटिवेशन स्पीकर विपुल शरण ने कहा कि "कौशल या शिक्षण विशेष की जानकारी के आधार पर योजना बनाने के हिसाब से देखें तो यह सर्वे ठीक लगता है, लेकिन जाति को बांटकर हरेक की गिनती करने का उद्देश्य गलत। ऐसे में कोर्ट का फैसला सही है, हालांकि भी यह संभावना बनती है कि कुछ बदलाव के साथ सरकार इसे आगे बढ़ाने के लिए कोर्ट से राहत की उम्मीद करे। वैसे, सरकार को ऐसे काम के लिए पहले जनता का मूड समझना चाहिए था।"