भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी नेता, महात्मा गांधी के निकट सहयोगी, होमरूल और असहयोग आंदोलन के प्रमुख स्तंभ व सदाकत आश्रम के संस्थापक मौलाना मजहरुल हक़ का संपूर्ण जीवन देश की एकता, सामाजिक न्याय और कौमी सद्भाव को समर्पित रहा। हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रबल समर्थक मौलाना मजहरुल हक़ की 159वीं जयंती पर आज पूरा देश उन्हें श्रद्धा और सम्मान के साथ याद कर रहा है।
ब्रह्मपुर गांव में हुआ था जन्म
जानें क्यों न्यायिक सेवा से त्यागपत्र दे दिया था?
इंग्लैंड प्रवास के दौरान ही उनकी महात्मा गांधी से ऐतिहासिक मुलाकात हुई। जहाज की यात्रा के दौरान बनी यह मित्रता जीवन भर कायम रही। भारत लौटने के बाद उन्होंने पटना में वकालत प्रारंभ की और उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा में भी शामिल हुए, लेकिन अंग्रेजी हुकूमत द्वारा भारतीयों के साथ किए जा रहे भेदभाव से आहत होकर वर्ष 1896 में उन्होंने न्यायिक सेवा से त्यागपत्र दे दिया और बिहार के छपरा में वकालत करने लगे।
हालांकि उनका जन्म पटना जिले में हुआ था, लेकिन उनकी कर्मभूमि सारण जिला ही रही। छपरा में रहते हुए उन्होंने सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों को नई दिशा दी। वे छपरा नगर पालिका के उपाध्यक्ष बने और सारण जिला परिषद के प्रथम अध्यक्ष के रूप में भी कार्य किया, जिससे जिले का गौरव बढ़ा।
छपरा शहर के रामराज्य मोड़ (महमूद चौक) स्थित ‘हक मंजिल’ उनका प्रमुख ठिकाना रहा। आज इसी भवन में मौलाना मजहरुल हक़ अरबी-फारसी-उर्दू विश्वविद्यालय का अध्ययन केंद्र संचालित हो रहा है। मौलाना साहब के निधन के बाद महात्मा गांधी ने कहा था कि ऐसे व्यक्ति की गैरमौजूदगी सदा खलेगी।
आज उपेक्षा और जर्जरता का शिकार है एकता भवन
बिहार में अनिवार्य और निःशुल्क प्राथमिक शिक्षा लागू कराने के लिए उन्होंने लंबा संघर्ष किया। अपने पैतृक घर को मदरसा और प्राथमिक विद्यालय की स्थापना के लिए दान कर दिया, ताकि हिंदू और मुस्लिम बच्चे एक ही परिसर में साथ पढ़ सकें। महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए उन्होंने पर्दा प्रथा के खिलाफ भी जनजागरण किया।
ये भी पढ़ें- Bihar: बेंगलुरु में ‘विकसित बिहार @2047’ क्यों बना चर्चा का केंद्र? 1200 से अधिक प्रतिभागियों ने लिया हिस्सा
मौलाना मजहरुल हक़ का जीवन और विचार आज भी देश के लिए प्रेरणा हैं। उनका यह कथन “हम हिन्दू हों या मुसलमान, हम एक ही नाव पर हैं सवार; हम उबरेंगे तो साथ, डूबेंगे तो साथ” आज के दौर में और भी अधिक प्रासंगिक हो गया है।
‘आशियाना’ नाम से अपना घर बनवाया था
असहयोग आंदोलन के दौरान मौलाना मजहरुल हक़ ने ऐशो-आराम का त्याग कर फकीरी जीवन अपना लिया और जीवन के अंतिम दिनों तक अत्यंत सादगीपूर्ण जीवन व्यतीत किया। 27 दिसंबर 1929 को उन्हें पक्षाघात का आघात लगा और 2 जनवरी 1930 को उन्होंने अंतिम सांस ली। उन्हें उनके घर के बगीचे में ही सुपुर्द-ए-खाक किया गया।