फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

न पद की चाह, न सत्ता का मोह; फिर भी देश की राजनीति बदल गए जेपी, पर जन्मभूमि पर विकास का अब भी सवाल

Sun, 11 Oct 2026 02:21 PM IST
सारण ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सारण

सार

लोकनायक जयप्रकाश नारायण की 124वीं जयंती पर उनकी जन्मभूमि सिताब दियारा के विकास और उनकी विचारधारा की प्रासंगिकता पर सवाल उठ रहे हैं। 11 अक्तूबर 1902 को सारण जिले के सिताब दियारा के लाला टोला में जन्मे जेपी ने स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर संपूर्ण क्रांति तक देश की राजनीति को नई दिशा दी।
विज्ञापन
लोक नायक जयप्रकाश नारायण - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

जिस लोकनायक जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति के आह्वान ने देश की राजनीति को नई दिशा दी, जिन्होंने लोकतंत्र की रक्षा के लिए तत्कालीन सत्ता को खुली चुनौती दी और जिनके नेतृत्व में देश ने राजनीतिक बदलाव का एक ऐतिहासिक दौर देखा, उनकी जन्मभूमि आज भी विकास की प्रतीक्षा कर रही है। सत्ता के शिखर पर पहुंचे बिना राष्ट्रीय राजनीति पर गहरी छाप छोड़ने वाले जेपी की विरासत और विचार आज भी प्रासंगिक हैं। हालांकि, सारण जिले के सिताब दियारा में उनके सपनों को विकास, सामाजिक न्याय और जनभागीदारी के रूप में कितना साकार किया जा सका है, यह सवाल उनकी 124वीं जयंती पर फिर चर्चा में है।

विज्ञापन


11 अक्तूबर 1902 को सारण जिले के रिविलगंज प्रखंड और थाना क्षेत्र के अंतर्गत सिताब दियारा के लाला टोला में जन्मे जयप्रकाश नारायण केवल स्वतंत्रता सेनानी या विपक्षी राजनीति के प्रतीक नहीं थे। वह एक ऐसे विचारक और जननायक थे, जिन्होंने राजनीति को सत्ता हासिल करने का माध्यम मानने के बजाय समाज परिवर्तन का औजार बनाने पर जोर दिया। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि किसी संवैधानिक पद पर बैठे बिना भी कोई व्यक्ति अपने विचारों, त्याग और संघर्ष के दम पर राष्ट्रीय राजनीति पर गहरी छाप छोड़ सकता है।

आजादी की लड़ाई से संपूर्ण क्रांति तक का सफर

जयप्रकाश नारायण का राजनीतिक जीवन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के उथल-पुथल भरे दौर में आकार लेता गया। उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका गए जेपी ने वहां श्रम किया और विभिन्न राजनीतिक एवं सामाजिक विचारधाराओं का अध्ययन किया। भारत लौटने के बाद वह स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय हो गए और कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के गठन में प्रमुख भूमिका निभाई। समाजवाद के प्रति उनकी प्रतिबद्धता ने उन्हें उन नेताओं की अग्रिम पंक्ति में खड़ा कर दिया, जो राजनीतिक आजादी के साथ सामाजिक और आर्थिक समानता को भी जरूरी मानते थे।

1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उनकी भूमिका ने उन्हें एक संघर्षशील क्रांतिकारी के रूप में स्थापित किया। हजारीबाग केंद्रीय कारागार से निकलने के बाद उन्होंने भूमिगत आंदोलन को गति दी। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ उनका संघर्ष केवल राजनीतिक आजादी तक सीमित नहीं था, बल्कि वह ऐसी व्यवस्था चाहते थे, जिसमें आम आदमी को सम्मान, अवसर और न्याय मिल सके। आजादी के बाद जेपी ने सत्ता की राजनीति से दूरी बनाकर सर्वोदय, ग्राम स्वराज और सामाजिक पुनर्निर्माण के रास्ते को महत्व दिया। विनोबा भावे के भूदान आंदोलन से उनका जुड़ाव भी इसी सोच का हिस्सा था। उनके लिए लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव कराना नहीं था, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति को निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी देना भी था।

जब एक आह्वान ने बदल दी देश की राजनीति

1970 के दशक में महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और शासन व्यवस्था के प्रति बढ़ते असंतोष के बीच जेपी एक बार फिर सक्रिय राजनीति के केंद्र में आए। बिहार के छात्र आंदोलन ने उनसे नेतृत्व करने का आग्रह किया। इसके बाद उन्होंने आंदोलन को व्यापक स्वरूप देते हुए संपूर्ण क्रांति का आह्वान किया।

विज्ञापन

यह आह्वान केवल सरकार बदलने तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके तहत राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक और नैतिक जीवन में बदलाव की परिकल्पना की गई थी। जेपी ने युवाओं को व्यवस्था में व्याप्त विसंगतियों के खिलाफ शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से आवाज उठाने के लिए प्रेरित किया। उनके आंदोलन ने देशभर में राजनीतिक चेतना को नई ऊर्जा दी।

1975 में आपातकाल लागू होने के बाद जेपी लोकतांत्रिक अधिकारों की बहाली के संघर्ष के प्रमुख चेहरों में शामिल रहे। उनके नेतृत्व में विभिन्न विपक्षी धाराएं एकजुट हुईं। इसके बाद 1977 के आम चुनाव में कांग्रेस की हार हुई और केंद्र में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनी। यह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक निर्णायक मोड़ था। जेपी ने स्वयं कोई सरकारी पद स्वीकार नहीं किया, लेकिन उनके संघर्ष ने यह स्थापित किया कि लोकतंत्र में जनता की शक्ति किसी भी सरकार से बड़ी हो सकती है।

विचार आज भी प्रासंगिक, लेकिन सवाल कायम

जयप्रकाश नारायण का मानना था कि भ्रष्टाचार, असमानता और सत्ता के केंद्रीकरण जैसी समस्याओं का समाधान केवल राजनीतिक चेहरों को बदलने से नहीं हो सकता। इसके लिए व्यवस्था, संस्थाओं और नागरिक चेतना में बदलाव जरूरी है। आज भी बेरोजगारी, सामाजिक असमानता, सार्वजनिक जवाबदेही और राजनीति में नैतिकता जैसे सवाल चर्चा के केंद्र में हैं। ऐसे में जेपी के विचारों पर नए सिरे से विचार करने की जरूरत महसूस होती है।

उनकी संपूर्ण क्रांति का उद्देश्य किसी एक राजनीतिक दल का समर्थन या विरोध करना नहीं था, बल्कि शासन और समाज के हर स्तर पर जवाबदेही सुनिश्चित करना था। यही वजह है कि अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं से जुड़े लोग भी उनकी विरासत का उल्लेख करते हैं।
हालांकि, उनकी जयंती पर केवल श्रद्धांजलि देना पर्याप्त नहीं है। शिक्षा, रोजगार, सामाजिक न्याय, पारदर्शिता और स्थानीय स्वशासन के क्षेत्र में उनके विचारों को जमीन पर उतारना ही उनके प्रति वास्तविक सम्मान होगा।

जन्मभूमि के विकास का सवाल अब भी अहम

लोकनायक जयप्रकाश नारायण की जन्मभूमि सिताब दियारा उनके संघर्ष और विचारों की ऐतिहासिक पहचान है। संपूर्ण क्रांति के नायक की 124वीं जयंती पर उनकी विरासत को याद करने के साथ यह सवाल भी अहम है कि उनके गांव और आसपास के क्षेत्र में विकास, सामाजिक न्याय और जनभागीदारी के उनके सपनों को किस हद तक साकार किया जा सका है। जेपी ने जिस व्यवस्था में आम लोगों की भागीदारी और सम्मान को सर्वोपरि माना था, उस सोच को धरातल पर उतारना आज भी एक बड़ी चुनौती है। उनकी जयंती इस बात की याद दिलाती है कि किसी जननायक को सच्ची श्रद्धांजलि उसके विचारों को अपनाने और समाज में सकारात्मक बदलाव लाने से ही दी जा सकती है।

 

विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें