सारण जिले के मढ़ौरा नगर पंचायत स्थित गढ़देवी मंदिर आज पूरे बिहार में आस्था और श्रद्धा का एक प्रमुख केंद्र बन चुका है। यह मंदिर न सिर्फ स्थानीय लोगों की धार्मिक पहचान है, बल्कि राज्य के विभिन्न जिलों से आने वाले लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का भी केंद्र है। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से पूजा-अर्चना करने पर हर तरह की मनोकामना पूरी होती है। यही कारण है कि साल भर यहां श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है। विशेषकर चैत नवरात्र के दौरान मंदिर की भव्यता और दिव्यता अपने चरम पर पहुंच जाती है।
श्रद्धालुओं को जीवंत दर्शन का होता है अनुभव
मंदिर परिसर में प्रवेश करते ही भक्तों को एक अलग आध्यात्मिक अनुभूति होती है। स्थानीय निवासी संजीव कुमार गिरी का कहना है कि यहां माता का साक्षात वास है और कई श्रद्धालुओं को जीवंत दर्शन का अनुभव भी होता है। नवरात्र के दौरान श्रद्धालु माता की विशेष कृपा का अनुभव करते हैं, जिससे मंदिर की महिमा और भी बढ़ जाती है। शायद यही वजह है कि इस दौरान दर्शन के लिए लंबी कतारें लग जाती हैं और पूरा क्षेत्र भक्ति में डूब जाता है।
रहसू भगत की पुकार पर आई थी मां कामाख्या
गढ़देवी मंदिर को आदि शक्ति का महत्वपूर्ण स्थल माना जाता है। इससे जुड़ी कई प्राचीन किंवदंतियां प्रचलित हैं। मान्यता है कि माता अपने परम भक्त रहसू भगत की पुकार सुनकर कामाख्या मंदिर से गोपालगंज के थावे के लिए प्रस्थान की थीं। इस यात्रा के दौरान मढ़ौरा उनका अंतिम पड़ाव था, जहां उन्होंने विश्राम किया। इसके बाद वह थावे मंदिर पहुंचीं। इस कारण यह स्थल अत्यंत पवित्र और शक्तिशाली माना जाता है।
माता सती के रक्त की बूंदें इस स्थल पर पड़ी थीं
एक अन्य धार्मिक कथा के अनुसार, जब राजा दक्ष के यज्ञ में माता सती ने अपने प्राण त्याग दिए, तब भगवान शिव उनके शव को लेकर तांडव करने लगे। ब्रह्मांड में संतुलन बनाए रखने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता के शरीर को खंडित किया। माना जाता है कि सती के शरीर से गिरी रक्त की बूंदें इस स्थल पर पड़ी थीं, जिससे यह स्थान शक्तिपीठ के समान पवित्र हो गया।
सोमवार और शुक्रवार को यहां लगता है विशेष मेला
गढ़देवी मंदिर इस अनुमंडल का सबसे अधिक चढ़ावा प्राप्त करने वाला मंदिर भी माना जाता है। प्रत्येक सोमवार और शुक्रवार को यहां विशेष मेला लगता है, जिसमें हजारों श्रद्धालु शामिल होते हैं। धार्मिक न्यास परिषद द्वारा संचालित इस मंदिर को सालाना लगभग 25 से 30 लाख रुपये का चढ़ावा प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त, कई श्रद्धालु मंदिर के विकास और अन्य कार्यों के लिए सीधे दान भी करते हैं। नवरात्र के समय यह राशि और भी बढ़ जाती है।
लोगों की मुरादे होती हैं पूरी
श्रद्धालुओं में यह मान्यता प्रचलित है कि संतान की इच्छा रखने वाली महिलाओं को यहां पुत्र प्राप्ति का आशीर्वाद मिलता है। युवतियों को मनचाहा वर और बेरोजगार युवाओं को रोजगार मिलने की भी श्रद्धा है। संजीव कुमार गिरी का कहना है कि मंदिर में सेवा करने वाले कई युवाओं को सरकारी नौकरी प्राप्त हुई है, जिससे यहां सेवा करने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है।
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बनाया जा रहा मंदिर के लिए भव्य गुंबद
मंदिर के विकास को लेकर भी विशेष कार्य चल रहे हैं। मुख्य गर्भगृह का पुनर्निर्माण किया जा रहा है और इसके ऊपर एक भव्य गुंबद बनाया जाएगा। मंदिर प्रबंध समिति इस निर्माण पर लगभग 35 से 40 लाख रुपये खर्च कर रही है। बताया जा रहा है कि यह गुंबद विंध्यवासिनी मंदिर की तर्ज पर बनाया जाएगा, जिससे मंदिर की सुंदरता और भव्यता और बढ़ जाएगी। निर्माण कार्य पूरा होने के बाद यह मंदिर और अधिक आकर्षक और भव्य स्वरूप में नजर आएगा।