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बिहार: सोमवार और शुक्रवार को बढ़ जाती है श्रद्धालुओं की भीड़, नीम के पेड़ में विराजमान हैं गढ़देवी माता

Sat, 17 Oct 2026 04:11 PM IST
सारण ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, छपरा

सार

बिहार के सारण जिले के मढ़ौरा स्थित गढ़देवी माता मंदिर श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का केंद्र है। नीम के पेड़ में विराजमान मां के दर्शन के लिए दूर-दराज से भक्त पहुंचते हैं। मंदिर प्राचीन मान्यताओं, धार्मिक कथाओं और लोकपरंपराओं से जुड़ा है।

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मढ़ौरा की गढ़देवी मंदिर - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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बिहार के सारण जिला मुख्यालय से लगभग 35 किलोमीटर दूर स्थित मढ़ौरा की पहचान कभी चीनी मिलों और औद्योगिक गतिविधियों से हुआ करती थी। आज भले ही यहां की पुरानी मिलों की चिमनियां खामोश हैं, लेकिन इस ऐतिहासिक नगर की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान अब भी कायम है। इसी पहचान का प्रमुख केंद्र है गढ़देवी माता का मंदिर। यहां नीम के पेड़ में विराजमान मां के प्रति श्रद्धालुओं की गहरी आस्था है। दूर-दराज से भक्त यहां दर्शन-पूजन के लिए पहुंचते हैं और अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए माता के दरबार में मत्था टेकते हैं।

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प्राचीन मान्यताओं से जुड़ा है मंदिर का इतिहास
मढ़ौरा के एक छोर पर स्थित गढ़देवी मंदिर को स्थानीय लोग शक्ति और श्रद्धा का प्रमुख केंद्र मानते हैं। मंदिर के इतिहास को लेकर कई धार्मिक मान्यताएं और लोककथाएं प्रचलित हैं। मान्यता है कि मां दुर्गा गोपालगंज स्थित थावे धाम की यात्रा के दौरान मढ़ौरा में रुकी थीं। इसी मान्यता से इस स्थान की धार्मिक महत्ता जुड़ी हुई है।

सोमवार और शुक्रवार को उमड़ते हैं श्रद्धालु
गढ़देवी मंदिर में सोमवार और शुक्रवार को विशेष पूजा-अर्चना की परंपरा है। इन दिनों मंदिर में श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ जाती है। भक्त मां के दर्शन कर सुख-समृद्धि, शांति और परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं। स्थानीय लोगों के लिए यह मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थल नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही आस्था और परंपरा का प्रतीक भी है।
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माता सती की कथा से भी जुड़ी है मान्यता
मंदिर से जुड़ी एक प्रचलित धार्मिक कथा माता सती और भगवान शिव से संबंधित है। मान्यता के अनुसार, राजा दक्ष के यज्ञ में सती के देह त्यागने के बाद भगवान शिव उनके पार्थिव शरीर को लेकर तांडव करने लगे थे। सृष्टि को विनाश से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को खंडित किया। धार्मिक मान्यता है कि जहां-जहां उनके अंग गिरे, वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई।

स्थानीय लोककथा के अनुसार, मढ़ौरा के इस स्थान पर माता सती के पवित्र रक्त की कुछ बूंदें गिरी थीं। इसी विश्वास के कारण इस स्थल के प्रति श्रद्धालुओं की विशेष आस्था है। यह मान्यता स्थानीय धार्मिक परंपरा और लोकविश्वास का हिस्सा है।

चीनी मिल की स्थापना से भी जुड़ी है लोककथा
मढ़ौरा कभी औद्योगिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र रहा है। स्थानीय इतिहास के अनुसार, वर्ष 1904 में यहां चीनी मिल की स्थापना हुई थी। इसके अलावा मोर्टन उत्पादों और शराब से जुड़ी औद्योगिक इकाइयां भी यहां संचालित होती थीं। वर्तमान में इन पुरानी मिलों की गतिविधियां बंद हो चुकी हैं।

चीनी मिल के निर्माण को लेकर भी एक लोककथा प्रचलित है। कहा जाता है कि निर्माण के दौरान माता की उपेक्षा के कारण बार-बार बाधाएं आ रही थीं। इसके बाद लोगों ने कई दिनों तक माता की पूजा-अर्चना की, जिसके बाद निर्माण कार्य आगे बढ़ सका। यह कथा आज भी स्थानीय जनश्रुति का हिस्सा है।

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गढ़देवी और शिल्हौरी मंदिर हैं मढ़ौरा की धार्मिक पहचान
मढ़ौरा की धार्मिक पहचान में गढ़देवी माता मंदिर के साथ शिल्हौरी स्थित शिव मंदिर का भी विशेष स्थान है। दोनों धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रहती है। औद्योगिक अतीत के लिए पहचाना जाने वाला मढ़ौरा आज भी अपने धार्मिक स्थलों, लोकविश्वासों और सांस्कृतिक विरासत के कारण लोगों को आकर्षित करता है। नीम के पेड़ में विराजमान गढ़देवी माता का दरबार इसी विरासत और जनआस्था की विशिष्ट पहचान है।

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