खुद को किंग मेकर मानते-मानते, अब आखिरकार प्रशांत किशोर स्वयं बिहार विधानसभा में एक विधायक बनने के लिए चुनाव मैदान में उतर रहे हैं। प्रशांत किशोर दो महीने पहले तक इस बात का खंडन कर रहे थे। फिर, यह दिखा कि लगभग 15 दिनों से उनके चुनाव में उतरने की तैयारी चलने लगी। चार दिन पहले अपने ही खंडन का 'खंडन' करते हुए जन सुराज ने स्पष्ट संकेत दिया। आज, रविवार को प्रशांत किशोर खुद सामने आए और बांकीपुर उप चुनाव में उतरने का एलान किया। बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र भारतीय जनता पार्टी की पारंपरिक सीट है। पूरे 31 साल से यहां कमल खिलता रहा है। तो क्या यह प्रशांत किशोर के लिए रिस्क है? या, यह प्रशांत किशोर का चैलेंज है? और, अगर यह चैलेंज है तो इसकी वजह क्या है?
प्रशांत किशोर ने बिहार विधानसभा चुनाव से कुछ समय पहले अपने संगठन जनसुराज को जन सुराज पार्टी के रूप में स्थापित किया। पूरे बिहार में सबसे ज्यादा पीले रंग की उनकी गाड़ियां नजर आती थीं। चुनाव परिणाम आया तो उनके दावों के साथ ज्यादातर गाड़ियों से वह स्टीकर या तो गायब हो गया या वह गाड़ियां ही सड़क पर नजर आनी बंद हो गईं। बांकीपुर के भाजपा विधायक नितिन नवीन के राज्यसभा जाने से खाली हुई सीट पर उप चुनाव की तैयारी निर्वाचन आयोग के अलावा कोई और कर रहा था तो भाजपा। दो महीने पहले तक पीके और उनकी पार्टी खंडन करती रही कि वह बांकीपुर के चुनाव में नहीं उतरेंगे, लेकिन करीब 15 दिनों से अचानक तैयारी तेज हो गई चुनावी मैदान की। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष मनोज भारती ने चार दिन पहले संवाददाताओं से जो कहा, उससे चार आधार संकेत के रूप में सामने आए। यह चार आधार भाजपा को डराने वाले हो सकते हैं। यही आधार प्रशांत किशोर की हिम्मत बने।
प्रशांत किशोर की पार्टी ने बिहार विधानसभा चुनाव में प्रचार तो गांव-गांव तक किया था, लेकिन उसे वोटरों का सहयोग खुलकर शहरी क्षेत्रों में मिला, खासकर युवाओं का साथ मिला। जन सुराज के 238 प्रत्याशियों में से भले ही 236 की जमानत जब्त हो गई, लेकिन उसे राज्य में 16.77 लाख कुल वोट मिले थे। एक भी सीट पर जीत नहीं मिली, इसलिए जन सुराज पार्टी का मनोबल टूट गया। इसके बावजूद उसे यह पता चल गया कि शहरी युवा उसका साथ देने के लिए आगे आया था। पटना की बांकीपुर से ज्यादा राज्य की कोई सीट शहरी नहीं है। यहां कुल 422 मतदान केंद्र हैं और सारे के सारे शहरी। एक भी ग्रामीण नहीं। बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र में वोटरों की संख्या 3.79 लाख है और महज 7895 ही वोटर 80+ वाले हैं। वोटरों का यह गणित और भूगोल जन सुराज के प्रशांत किशोर के उतरने पर फायदेमंद रहेगा- यह पार्टी की आंतरिक रिपोर्ट में भी है।
प्रशांत किशोर की हिम्मत का आधार- 2
मौके पर चौका मारने का इससे अच्छा अवसर नहीं मिल सकता है, यह भी एक बड़ा कारण है। बिहार विधानसभा चुनाव के आठ महीने पूरे हो चुके हैं और नौवां चल रहा है। चुनाव में एनडीए '25 से 30, फिर से नीतीश' के नारे को स्वीकार करती दिख रही थी, लेकिन 2026 में ही अप्रैल के महीने में नीतीश कुमार ने कुर्सी छोड़ दी और भाजपा ने पहली बार अपना मुख्यमंत्री बना लिया। इस पूरे घटनाक्रम के बीच बांकीपुर के विधायक और राज्य के मंत्री नितिन नवीन को भाजपा ने दिल्ली बुलाकर राष्ट्रीय अध्यक्ष भी बनाया और राज्यसभा भी भेज दिया। यानी, नौ महीने के राजनीतिक उलटफेर के बीच प्रशांत किशोर को अपनी गलती (अगर वह विधानसभा चुनाव में नहीं उतरने के फैसले को गलती मानते हों तो, हालांकि विश्लेषक जन सुराज के खराब प्रदर्शन की वजह मानते रहे हैं) सुधारने का मौका मिला है बांकीपुर में।
प्रशांत किशोर की हिम्मत का आधार- 3
बिहार विधानसभा में 243 सीटों पर जन सुराज के प्रत्याशियों की तैयारी चल रही थी। पार्टी के 238 प्रत्याशी मैदान में रहे थे। इन सभी प्रत्याशियों के लिए पार्टी के प्रचार का पूरा तंत्र लगा था। पार्टी का पूरा फंड इतनी जगह बंट रहा था। पार्टी को आर्थिक संबल देने वाले जहां-तहां बंट गए थे। गिने-चुने नामी चेहरे प्रचार-चुनाव में थे। चुनाव में करारी शिकस्त के बाद जन सुराज की आंतरिक टीम में भारी टूट-फूट हुई। आकर्षित होकर आए लोग भारी संख्या में निकल गए। जो बचे, वह पूर्ण आस्था वाले। जुड़ाव वाले। अब यह पूरी ताकत के साथ सिर्फ एक सीट पर चुनाव जिताने के लिए उतरेंगे। प्रचार में आर्थिक, शारीरिक और मानसिक ताकत झोंकेंगे। शहरी सीट है और पटना आना कहीं से भी बहुत मुश्किल नहीं। ऐसे में राज्य के कोने-कोने से बांकीपुर में जन सुराज पार्टी के नेता, कार्यकर्ता, समर्थक न केवल प्रचार के लिए आ रहे हैं, बल्कि अपने नाते-रिश्तेदारों से जनसंपर्क शुरू भी कर चुके हैं।
प्रशांत किशोर की हिम्मत का आधार- 4
"शहरी वोटर भाजपा समर्थक है, लेकिन साथ-साथ वह यह भी समझता है कि एक सीट हारने से भाजपा की सेहत पर बुरा असर नहीं पड़ेगा, लेकिन उसे सीख मिल सकती है। इसलिए, जन सुराज गुस्से को आवाज देने का प्रयास करे तो कुछ आश्चर्यजनक नहीं होगा।"
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सुनील कुमार सिन्हा, अध्यक्ष
चाणक्या स्कूल ऑफ पॉलिटिकल राइट्स एंड रिसर्च