भारत के दूसरे शहरों की तरह पटना में भी अब महिलाएं ऑटो रिक्शा की ड्राइविंग सीट पर बैठकर पूरे आत्मविश्वास से ऑटो चलाती दिखाई देती हैं।
अभी पटना में फिलहाल आठ महिलाएं पटना जंक्शन और हवाई अड्डे के प्री-पेड ऑटो स्टैंड से यात्रियों को उनकी मंजिल तक पहुंचा रही हैं।
इन्होंने सबसे पहले पटना जंक्शन पर 2013 में 18 अगस्त को ऑटो की स्टीयरिंग संभाली थी।
ऑटो का सफर
पिछले साल ही एक सितंबर को पटना हवाई अड्डे से भी महिलाओं ने ऑटो चलाना शुरू किया। हालांकि हवाई अड्डे पर शुरुआत में कुछ दिन के लिए एयरपोर्ट अथॉरिटी ने रोक लगाई थी, पर बाद में वहां फिर से महिलाओं को ऑटो चलाने की अनुमति मिल गई।
बिहार में महिलाओं के सशक्तीकरण के इस नए तरीके को ढूंढने से लेकर अंजाम देने तक का पूरा श्रेय पटना जिला ऑटो रिक्शा चालक संघ को है।
संघ के पदाधिकारी जब पिछले साल अप्रैल में केरल गए, तो वहां महिला ऑटो चालकों को देखकर उन्होंने बिहार में भी ऐसी ही पहल करने की सोची।
संघ अब तक पचास महिलाओं को तीन महीने की ट्रेनिंग देकर प्रशिक्षित कर चुका है। इन्हें मार्शल आर्ट की भी ट्रेनिंग दी गई है। संघ के अनुसार पहले चरण की सफलता के बाद अब बहुत सारी महिलाएं ऑटो चलाने की ट्रेनिंग चाहती हैं।
ट्रेनिंग से लेकर अब तक इन महिलाओं की सफलता की कहानियों को अखबारों और समाचार चैनलों में नियमित रूप से जगह मिल रही है और एक टेली फिल्म भी बन चुकी है।
रामप्यारी, धन्नो, स्कूटी
ऑटो चालक अनीता देवी के अनुसार वे और उनकी सहेलियां जल्द ही कलर्स चैनल के 'इंडियाज गॉट टैलेंट' कार्यक्रम में भी दिखाई देंगी। यही नहीं, एक लाइफ स्टाइल चैनल ने 'नौ देवियां' कार्यक्रम के एंकर के रूप में ऑटो चालक गुडिया सिन्हा का चयन किया है। यह कार्यक्रम गुडिया जैसी महिलाओं पर ही केंद्रित है।
इन महिला ऑटो चालकों की सरकार से मांग है कि वह उनके जैसी महिलाओं को बढावा देने के लिए मुफ्त या कम-से-कम सब्सिडी पर ऑटो देने का काम करे।
इन महिलाओं ने अपने ऑटो को अलग-अलग नाम दिए हैं। अपने ऑटो को कोई रामप्यारी, कोई स्कूटी तो कोई धन्नो के नाम से इन्हें पुकारता है।
इनमें से एक रिंकी तो कभी-कभी सब्जी लाने जैसे घर के दूसरे कामों के लिए भी ऑटो को स्कूटी की तरह काम में लाती हैं।
बदलाव की कहानी
ऑटो चलाते हुए ये महिलाएं न सिर्फ अपने पैरों पर खडी हुईं, बल्कि पुरुषों द्वारा स्थापित गलत मान्यताओं को भी खारिज कर रही हैं।
सुष्मिता कुमारी कहती हैं कि पहले उनके पति, जो खुद भी पेशे से ऑटो ड्राइवर हैं, काम के दौरान और उसके बाद थकान मिटाने के लिए तंबाकू से लेकर शराब तक के नशे को जरूरी बताते थे और वह चाह कर भी रोक नहीं पाती थीं।
अब वह काम से लौटने के बाद पलटकर पति से पूछती हैं कि मैं तो नशा नहीं करती तो फिर मेरी थकान कैसे दूर हो जाती है?
जाहिर है इन ऑटो चालकों ने महिलाओं के लिए न सिर्फ एक नए रोजगार का दरवाजा खोला है बल्कि इन्होंने समाज को भी झकझोरने का काम किया है।
ये महिलाएं घर और घर के बाहर, दोनों जगह पर वक्त के कागज पर बदलाव की कहानियां लिख रही हैं।