बिहार के वैशाली जिले के राघोपुर में गंगा नदी में नाव डूबने से 13 बच्चों की मौत ने कई परिवारों को उजाड़ दिया। इस दर्दनाक हादसे के बाद बच्चों के अंतिम संस्कार का तरीका भी चर्चा में आ गया। बच्चों के शवों को जलाने या दफनाने के बजाय गंगा नदी में विसर्जित किया गया। इसके पीछे कोई नई मान्यता या हादसे के बाद लिया गया फैसला नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही एक पारिवारिक परंपरा बताई जा रही है। राघोपुर के भगतान टोला के कुछ परिवारों का कहना है कि उनके वंश में आज तक किसी का दाह संस्कार नहीं हुआ है। पूर्वजों के समय से ही मृतकों के शवों को नदी में विसर्जित करने की परंपरा चली आ रही है। परिवार के लोग इसी रिवाज का पालन करते हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, इस परंपरा का संबंध कबीर पंथ से भी माना जाता है।
हमारे वंश में कभी नहीं हुआ दाह संस्कार: चंदन कुमार
राघोपुर के भगतान टोला में रहने वाले चंदन कुमार बताते हैं कि उनके परिवार में किसी की मृत्यु होने पर दाह संस्कार नहीं किया जाता। मृतक के शरीर को नदी में विसर्जित करने की परंपरा है, जो उनके पूर्वजों के समय से चली आ रही है। परिवार की कई पीढ़ियां इस रिवाज का पालन करती रही हैं। चंदन कुमार के अनुसार, उनके वंश में अब तक किसी का अंतिम संस्कार अग्नि के माध्यम से नहीं किया गया है। परिवार के लोग अपने पूर्वजों के बताए तरीके को ही अपनाते आए हैं। इसी वजह से नाव हादसे में जान गंवाने वाले बच्चों के शवों का भी इसी परंपरा के अनुसार अंतिम संस्कार किया गया। उन्होंने स्पष्ट किया कि बच्चों की मौत नदी में डूबने के कारण हुई, इसलिए उनके शवों को नदी में विसर्जित करने का फैसला नहीं लिया गया था। उनके परिवार में यह परंपरा पहले से प्रचलित है और सामान्य परिस्थितियों में भी मृतकों के लिए इसी का पालन किया जाता है।
क्या है कबीर पंथ?
स्थानीय लोगों के अनुसार, मृतकों के शवों को नदी में विसर्जित करने की इस परंपरा का संबंध कबीर पंथ से माना जाता है। कबीर पंथ संत कबीर की वाणी और शिक्षाओं पर आधारित धार्मिक परंपरा है। संत कबीर 15वीं सदी के प्रमुख संत-कवि थे और भक्ति आंदोलन की महत्वपूर्ण शख्सियतों में शामिल थे।
क्या होती है जल समाधि?
जल समाधि शब्द का इस्तेमाल कई बार मृत शरीर को नदी में प्रवाहित करने के अर्थ में किया जाता है, लेकिन धार्मिक संदर्भ में जल समाधि और शव को नदी में विसर्जित करना एक ही प्रक्रिया नहीं हैं। भारतीय धार्मिक परंपराओं में समाधि का संबंध आध्यात्मिक साधना से भी है। कुछ संप्रदायों में सिद्ध संतों के निधन के बाद उनके शरीर को भूमि में समाधि देकर उस स्थान को श्रद्धा का केंद्र बनाया जाता है। वहीं, कुछ परंपराओं में मृत शरीर को जल में प्रवाहित करने की प्रथा भी रही है।
शरीर प्रकृति में मिल जाए, इस विचार से जुड़ी है मान्यता
कबीर पंथ से जुड़ी कुछ व्याख्याओं में परमार्थ और जीवों के प्रति करुणा को महत्व दिया जाता है। इस विचार के अनुसार, मनुष्य को अपने जीवन में दूसरों की सेवा करनी चाहिए। कुछ अनुयायी इसी भावना को मृत्यु के बाद शरीर से भी जोड़कर देखते हैं। इस मान्यता के अनुसार, मनुष्य का शरीर प्रकृति से बना है और मृत्यु के बाद उसे फिर प्रकृति में मिल जाना चाहिए। शरीर के प्राकृतिक तत्व दूसरे जीवों और पर्यावरणीय चक्र का हिस्सा बनते हैं। कुछ लोग इसे इस विचार से जोड़ते हैं कि मृत्यु के बाद भी शरीर किसी न किसी रूप में दूसरे जीवों के काम आ सकता है। हालांकि, शरीर को प्रकृति में मिलाने से जुड़ी इस व्याख्या को कबीर पंथ के सभी अनुयायियों की एक समान मान्यता नहीं माना जा सकता।
पूर्वजों से मिले रिवाज का पालन करते हैं परिवार के लोग
राघोपुर के भगतान टोला में मृतकों के शवों को नदी में विसर्जित करने की परंपरा को परिवार के लोग अपने पूर्वजों से मिला रिवाज बताते हैं। स्थानीय स्तर पर इसे संत कबीर की शिक्षाओं से प्रेरित कबीर पंथ के विकास के साथ अलग-अलग क्षेत्रों में विकसित हुई परंपराओं में से एक माना जाता है।
गंगा नदी में नाव डूबने से 13 बच्चों की मौत के बाद यह परंपरा चर्चा में आई है। हालांकि, परिवार के अनुसार, शवों को नदी में विसर्जित करने का तरीका किसी नई मान्यता या हादसे के कारण नहीं अपनाया गया, बल्कि यह उनके परिवार में पहले से चली आ रही परंपरा का हिस्सा है।