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Bihar : इस पुल पर चढ़ गए तो दूसरी साइड से गिरेंगे जरूर; 40 मीटर लंबा पुल बना भूली सरकार, अप्रोच पथ ही नहीं

Sat, 16 May 2026 05:54 PM IST
तिरहुत ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मोतिहारी

सार

Bihar News : बिहार के 'पुल' खबरों में खूब रहते हैं। कभी गिरने के कारण तो कभी डूबने के कारण। कई बार तो आधे-अधूरे भी। इस बार 'अमर उजाला' ऐसा पुल सामने ला रहा है, जिसे भ्रष्टाचार की इंजीनियरिंग का नमूना कहना गलत नहीं होगा।
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उधर से पुल पर चढ़ी गाड़ियां उतरें तो कैसे? अप्रोच पथ नहीं। T शेप में गुजर रही सड़क। सामने पेड़। - फोटो : amar ujala digital
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विस्तार
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कोई पुल बनता है तो देखा जाता है कि उसपर लोग चढ़ेंगे कहां से और उतरेंगे कैसे? जो पुल ऐसा नहीं बनता, वह तो अपने आप में खबर है। ऐसी ही खबर है यह पुल। जिसमें एक तरफ से चढ़ने के लिए भारी ट्रैक्टर और रोड पिचिंग रोलर तक चढ़ जा रहे हैं, लेकिन दूसरी तरफ से उतरने का विकल्प ही नहीं है। लंबे समय से पुल बनकर खड़ा है तो किसी तरह किनारे से लोगों ने मिट्टी भरकर उतरने लायक बना लिया है। पुल के सामने तो सड़क और पेड़ हैं। मतलब, जहां पर अप्रोच पथ होना चाहिए- जगह ही नहीं है। 

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कहां पर है यह अनूठा पुल, पहले यह जानिए
यह बिहार के पूर्वी चंपारण में विकासात्मक योजनाओं के नाम पर सरकारी लापरवाही और भ्रष्टाचार की ऐसी तस्वीर है, जिसने पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आदापुर प्रखंड के लक्ष्मीपुर चौक पर प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना (PMGSY) के तहत करीब 3 करोड़ 14 लाख रुपये की लागत से पुल का निर्माण तो करा दिया गया, लेकिन पुल तक पहुंचने के लिए अप्रोच पथ ही नहीं बनाया जा सका। पुल मुख्य सड़क से सटाकर काफी ऊंचाई पर बना दिया गया है। वहां अप्रोच सड़क बनाने के लिए जगह थी ही नहीं, फिर भी पुल बनाकर छोड़ दिया गया है। करोड़ों रुपये खर्च कर ऐसा पुल खड़ा कर दिया गया, जिस पर चढ़ने का एक तरफ से रास्ता ही नहीं है।

रात में कोई अंजान आदमी उधर से आए तो धड़ाम से नीचे गिरेगा। - फोटो : amar ujala digital
पुल बना दिया, तब कहा- अप्रोच की जगह नहीं
ग्रामीणों की सूचना पर 'अमर उजाला' की टीम जब यहां पहुंची तो यह वास्तव में बेहद अजीब लगा। सड़क सामने से दाएं-बाएं जा रही है, वहीं पर यह पुल शुरू हो रहा है। मतलब, पुल का अप्रोच बनाना हो तो इस सीधी सड़क को कहीं दूर से घुमाना पड़ेगा। पेड़ों को हटाना पड़ेगा। उसके बगैर उपयोग ही संभव नहीं। बड़ा सवाल यह है कि जो सच सामने है, वह पुल की स्वीकृति देने वाले सरकारी अफसरों को क्यों नहीं दिखा या पुल बनाने वालों के मन में यह सवाल क्यों नहीं आया? इस सवाल का जवाब जब ग्रामीणों से समझने का प्रयास किया गया तो उन्होंने कहा कि निर्माण एजेंसी और विभागीय इंजीनियरों ने सबकुछ देखने के बावजूद बगैर किसी ठोस योजना और तकनीकी जांच के पुल का निर्माण करा दिया। पहले पुल बना दिया गया और फिर कहने लगे कि इसे मुख्य सड़क से जोड़ना आसान नहीं है। नतीजा यह हुआ कि पुल सिर्फ शोपीस बनकर खड़ा है।

दूसरी तरफ अप्रोच होने के कारण पुल पर भारी वाहन भी पहुंच जाते हैं। - फोटो : amar ujala digital
अंधेरे और बारिश में अंजान लोगों के लिए बड़ा खतरा
एक तरफ से लोग अप्रोच पथ के जरिए इसपर चढ़ जाते हैं, तो उतरने की जगह उन्हें एक मीटर नीचे सड़क नजर आती है। उस तक सीधा रास्ता नहीं है। स्थानीय लोगों ने किनारे मिट्टी डालकर रास्ता कामचलाऊ तो बनाया है, लेकिन बारिश और अंधेरे में यह खतरनाक हादसों की जगह बनकर रह गया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि कई बार अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों से शिकायत की गई, लेकिन किसी ने गंभीरता नहीं दिखाई। मौजूदा हालत यह है कि अगर कोई अंजान आदमी एक तरफ से गाड़ी लेकर रात में पुल पर चढ़ जाए तो उतरते समय उसका बड़ा हादसा तय है। इसके बावजूद सरकारी तंत्र जाग नहीं रहा है।
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प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना का विवरण लिखा है पुल के पास। - फोटो : amar ujala digital
गोलमाल है भई, सब गोलमाल है
मामले में एक और चौंकाने वाला खुलासा तब हुआ जब पुल निर्माण स्थल पर लगे बोर्ड के हिसाब से आगे पड़ताल की गई। बोर्ड पर साफ लिखा है कि पुल का निर्माण PWD विभाग द्वारा कराया गया है। जबकि PWD के कार्यपालक अभियंता ने स्पष्ट कहा कि यह पुल उनके विभाग का नहीं, बल्कि RWD का है। इसके बाद RWD के सहायक अभियंता और कार्यपालक अभियंता से संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन उन्होंने फोन उठाना तक जरूरी नहीं समझा। हालांकि RWD के अधीक्षण अभियंता ने बताया कि अप्रोच पथ निर्माण के लिए एस्टीमेट भेजा गया है और अब पूरा मामला चीफ इंजीनियर स्तर पर विचाराधीन है। 
(इनपुट- राजीव रंजन, पूर्वी चंपारण)
 
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