हालांकि जिला पुलिस का कहना है कि हत्या भूमि विवाद में हुई है। यहां तक कि चौक के नाम की बात दो साल पुरानी है। ये घटनाएं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान दोनों को असहज करने वाली हैं। 19 मार्च को नीतीश कुमार ने कहा कि उन्होंने जिस तरह से भ्रष्टाचार से समझौता नहीं किया है। उसी तरह से समाज में नफरत फैलाने वालों को भी बर्दाश्त नहीं करेंगे।
15 अप्रैल को पटना के गांधी मैदान में होने वाले इस सम्मेलन में तीन तलाक अहम मुद्दा होगा। यह सच्चाई है कि मुसलमान तीन तलाक बिल से सहमत नहीं हैं। खासकर पिछले शीतकालीन सत्र में जिस तरह से इस बिल को पास करने में जल्दबाजी दिखाई गई उसे लेकर लोगों की आपत्ति है। लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि मुसलमान पुरुष और महिला पर्सनल बोर्ड और ऐमरात-ए-शरिया के रुख पर सवाल नहीं खड़ा कर रहे हैं।
मुसलमानों के बीच यह आम राय है कि संकट की घड़ी में संस्थाएं उनके असली मुद्दो को ठीक से नहीं उठा पाती हैं। ये संगठन इस्लामी न्यायशास्त्र की एक धारा 'हनफी' का प्रतिनिधित्व करते हैं। सच्चाई यह है कि पर्सनल लॉ बोर्ड और ऐमरात के भीतर ही असहमति की कई आवाजें हैं। इनकी कार्यप्रणाली को लेकर संस्था के भीतर ही असहमतियां हैं।
मिसाल के तौर पर इदरा-ए-तहकीक-ओ-तसनीफ-ए-इस्लामी के सचिव रजी-उल-इस्लाम नदवी ने अपनी फेसबुक पोस्ट में सड़कों पर मुस्लिम महिलाओं के विरोध करने के तौर-तरीकों पर सवाल खड़ा किया है। पर्सनल लॉ बोर्ड के भीतर ही
मुसलमान बुद्धिजीवियों को लगता है कि तलाक-ए-बिद्दत जैसे मुद्दों को असदुद्दीन ओवैसी ने अपनी पार्टी का राजनीतिक मुद्दा बना दिया।
जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता अरशद अजमल का मानना है कि जो इस तरह के अभियानों का नेतृत्व कर रहे हैं वो आज की असली राजनीति को समझ नहीं पा रहे हैं। बीजेपी नहीं चाहती है कि मुसलमान इस तरह के रोड शो करें और दूसरी पार्टियां ऐसा करने की स्थिति में हैं नहीं। संयोग से पटना के जिस फुलवारी शरीफ में ऐमरात-ए-शरिया है। वहीं एक रिटायर्ड बैंक मैनेजर का परिवार मशहूर खानकाह से जुड़ा है। इनका कहना है कि इन मुद्दों को ओछी राजनीति का हिस्सा बना दिया गया है। उर्दू अखबार कौमी आवाज के नैयर फातमी कहते हैं, ''दीन और देश बचा हुआ है। पहले बीजेपी और बोर्ड के लोग ठीक हो जाए।''